बिलासपुर हवाई अड्डा: सेना की जमीन पर अवैध खनन का मामला सुलझा
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने बिलासपुर में चकरभाठा हवाईअड्डे के पास स्थित सेना की रक्षा भूमि से बड़े पैमाने पर मुरुम के अवैध उत्खनन से जुड़ी एक स्वत: संज्ञान जनहित याचिका (PIL) का निपटारा कर दिया है. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य और केंद्र सरकार के अधिकारियों द्वारा की गई त्वरित और समन्वित कार्रवाई पर संतोष व्यक्त करते हुए अदालती कार्यवाही को औपचारिक रूप से बंद कर दिया है. अदालत ने माना कि प्रशासन द्वारा उठाए गए सख्त कदमों से इस जनहित याचिका का मूल उद्देश्य काफी हद तक पूरा हो चुका है.
मीडिया रिपोर्टों के बाद अदालत ने लिया था स्वत: संज्ञान
यह पूरा मामला दिसंबर 2024 में सामने आया था, जब मीडिया में आई खबरों में आरोप लगाया गया था कि बिलासपुर के तेलसरा गांव में स्थित रक्षा विभाग की सुरक्षित जमीन से मुरुम चोरी किया जा रहा है. इन खबरों में यह भी दावा किया गया था कि इस चोरी की गई मुरुम का इस्तेमाल रायपुर रोड पर बन रही कुछ निजी आवासीय कॉलोनियों के निर्माण में धड़ल्ले से किया जा रहा है.
मामले की गंभीरता और सार्वजनिक हित को देखते हुए हाईकोर्ट ने इन खबरों के आधार पर खुद संज्ञान लिया था और इसे एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज कर संबंधित विभागों से जवाब तलब किया था.
वैज्ञानिक जांच में नहीं मिला चोरी की मुरुम का लिंक
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने निजी बिल्डरों द्वारा इस्तेमाल की जा रही निर्माण सामग्री के स्रोत को स्पष्ट करने के लिए प्रयोगशाला की वैज्ञानिक रिपोर्ट अदालत के सामने पेश की. लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा बिलासपुर की प्रमुख विकासशील कॉलोनियों फॉर्च्यून बिल्डकॉन, अमेया वेंचर्स और सनराइज एसोसिएट्स से मुरुम के नमूने एकत्र किए गए थे.
इन नमूनों की जांच सेना की जमीन से लिए गए मुरुम के नमूनों से की गई. प्रयोगशाला के वैज्ञानिक विश्लेषण में यह साफ हुआ कि निजी कॉलोनियों में इस्तेमाल हो रही मुरुम और सेना की जमीन की मुरुम का आपस में कोई मिलान नहीं है.
इससे पहले फॉर्च्यून एलीमेंट कॉलोनी के प्रोपराइटर पवन अग्रवाल ने भी एक हलफनामा दायर कर कोर्ट को बताया था कि निर्माण में इस्तेमाल की जा रही सामग्री सभी वैध वैधानिक अनुमतियों और रॉयल्टी भुगतान के साथ अधिकृत स्रोतों से खरीदी गई थी.
प्रशासन की मुस्तैदी और कड़ी कार्रवाई की सराहना
उच्च न्यायालय ने इस मामले में राजस्व, पुलिस और खनन विभागों द्वारा की गई मुस्तैद कार्रवाई की सराहना की है. जांच के दौरान प्रशासन ने अवैध परिवहन पर रोक लगाने के लिए अस्थाई चेक-पोस्ट बनाए थे और संयुक्त गश्ती दलों का गठन किया था. इसके अलावा विकासकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत रॉयल्टी पर्चियों और पारगमन पासों (ट्रांजिट पास) की गहनता से जांच की गई थी.
इस जांच के दौरान जिन जगहों पर नियमों का उल्लंघन पाया गया, वहां अधिकारियों ने खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत मुकदमों की झड़ी लगा दी थी.
भविष्य में लापरवाही पर दोबारा शुरू हो सकती है सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि रक्षा भूमि की सुरक्षा करना और अवैध खनन को पूरी तरह से रोकना संबंधित प्राधिकारियों का निरंतर वैधानिक कर्तव्य है. इसमें किसी भी स्तर पर ढील नहीं दी जानी चाहिए.
अदालत ने सभी प्रतिवादी अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे भविष्य में लघु खनिजों के किसी भी अवैध खनन, उत्खनन, परिवहन या भंडारण को रोकने के लिए कड़ी निगरानी बनाए रखें.
इसके साथ ही खंडपीठ ने यह चेतावनी भी दी है कि यदि भविष्य में इस संबंध में प्रशासन की ओर से कोई गंभीर लापरवाही या चूक कोर्ट के संज्ञान में आती है, तो अदालत के पास इस मामले की कार्यवाही को दोबारा पुनर्जीवित करने का पूरा अधिकार सुरक्षित है.