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गाड़ी की EMI बाउंस होने पर बैंक तुरंत नहीं कर सकता जब्ती

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24 जून 2026, 06:24 AM 3 मिनट में पढ़ें 1

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नई दिल्ली । डेस्क: लोन की कुछ किस्तें (EMIs) चूक जाने के बाद रिकवरी एजेंटों के फोन आना या बैंक से नोटिस मिलना किसी भी व्यक्ति के लिए बेहद तनावपूर्ण हो सकता है. आम तौर पर कर्जधारकों के मन में यह सबसे बड़ा डर होता है कि एक भी EMI मिस होने पर बैंक उनकी गाड़ी उठा ले जाएगा. 


हालांकि, बैंकिंग विशेषज्ञों और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार प्रक्रिया इस तरह काम नहीं करती है. कोई भी बैंक या वित्तीय संस्थान कर्जदाता के साथ हुए लोन एग्रीमेंट और बोर्ड से मंजूर रिकवरी पॉलिसी का पालन किए बिना सिर्फ एक या दो EMI बाउंस होने पर तुरंत वाहन जब्त नहीं कर सकता.

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आरबीआई के नियमों के मुताबिक, बैंकों के लिए लोन देते वक्त ही अपनी जब्ती प्रक्रिया, नोटिस की अवधि और रिकवरी के नियमों को पूरी तरह स्पष्ट करना अनिवार्य है. अगर कोई ग्राहक लगातार डिफॉल्ट करता है, तब भी बैंक को एक तय कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी. वे अचानक गाड़ी उठाने या डराने-धमकाने वाले हथकंडे नहीं अपना सकते. 


गाड़ी जब्त करने से पहले बैंक को ग्राहक को इसकी लिखित सूचना देनी होती है. इसके अलावा, यदि बैंक रिकवरी एजेंटों की मदद ले रहा है, तो ग्राहक को उस अधिकृत एजेंसी और एजेंटों के बारे में पूरी जानकारी पहले से दी जानी चाहिए.


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रिकवरी एजेंट गाड़ी को कब्जे में लेने के लिए किसी भी तरह के बल प्रयोग, धमकी या दुर्व्यवहार का सहारा नहीं ले सकते. आरबीआई की गाइडलाइंस के अनुसार, रिकवरी की प्रक्रिया पूरी तरह से पेशेवर और सम्मानजनक होनी चाहिए. 


एजेंटों के पास उचित पहचान पत्र और बैंक का अथॉरिटी लेटर होना अनिवार्य है. यदि कोई रिकवरी एजेंट अभद्र भाषा, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या डराने का प्रयास करता है, तो ग्राहक इसकी शिकायत बैंक के शिकायत निवारण तंत्र (Grievance Redressal Mechanism) में कर सकते हैं. 


बात न बनने पर आरबीआई के लोकपाल, उपभोक्ता फोरम या अदालत का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है.


कई लोग यह मान लेते हैं कि एक बार गाड़ी जब्त होने के बाद वह हमेशा के लिए हाथ से निकल गई, लेकिन ऐसा नहीं है. ज्यादातर मामलों में ग्राहकों को अपनी बकाया राशि चुकाकर गाड़ी वापस पाने का मौका दिया जाता है. 


बैंक गाड़ी को नीलाम करने से पहले ग्राहक को एक 'प्री-सेल नोटिस' भेजता है, जिसमें लोन रेगुलर करने का अंतिम अवसर दिया जाता है. यदि गाड़ी की नीलामी होती है, तो बैंक सिर्फ अपना बकाया लोन, ब्याज और रिकवरी का जायज खर्च ही रख सकता है. 


यदि गाड़ी उम्मीद से बेहतर कीमत पर बिकती है और उससे मिलने वाली रकम बैंक के बकाए से अधिक होती है, तो बची हुई अतिरिक्त राशि (सरप्लस) पर पूरी तरह से ग्राहक का हक होता है. इसके लिए ग्राहक बैंक से नीलामी की कीमत, बकाया राशि और खर्चों का पूरा विस्तृत स्टेटमेंट मांग सकते हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP