दूधराज को उपलब्धि क्यों बता रहा है USTR
USTR में दिखा 'दूधराज' का अद्भुत घोंसला
रायपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व में भारतीय पैराडाइज फ्लाईकैचर यानी दूधराज Terpsiphone paradisi के एक वीडियो को भी उपलब्धि की तरह प्रचारित किया जा रहा है.
पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश के राजकीय पक्षी दूधराज के इस वीडियो में यह पक्षी जंगल के एक सघन हिस्से में पेड़ की पतली शाखा पर घास के महीन तिनकों, वनस्पति रेशों और मकड़ी के जालों की सहायता से कप के आकार का घोंसला बनाते दिखाई देता है.
लेकिन उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व प्रबंधन इसे भी विशेष उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा है.
पक्षी विज्ञान और क्षेत्रीय जैव विविधता के संदर्भ में देखें तो यह घटना अपने आप में कोई असामान्य या दुर्लभ रिकॉर्ड नहीं है. भारतीय पैराडाइज फ्लाईकैचर मध्य भारत के वनों में व्यापक रूप से वितरित प्रजाति है और इसका घोंसला निर्माण व्यवहार दशकों से वैज्ञानिक साहित्य में दर्ज है.
यह पक्षी प्रजनन काल में प्रायः पेड़ों की खुली शाखाओं पर छोटा, गहरा और अत्यंत सुव्यवस्थित कपनुमा घोंसला बनाता है, जिसमें मकड़ी के जाल महत्वपूर्ण प्राकृतिक गोंद की भूमिका निभाते हैं. इसलिए उदंती-सीतानदी में इसका घोंसला बनाते दिखाई देना उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी के अनुरूप एक सामान्य घटना है, न कि कोई अभूतपूर्व खोज.
दूधराज छत्तीसगढ़ के उन पक्षियों में शामिल है, जिनकी उपस्थिति राज्य के लगभग सभी प्रमुख वन परिदृश्यों में दर्ज की गई है. बस्तर, कांगेर घाटी, अबूझमाड़ के सीमावर्ती वन, उदंती-सीतानदी, अचानकमार, बारनवापारा, गोमर्दा, सरगुजा, जशपुर और कोरिया जैसे क्षेत्रों में यह नियमित रूप से देखा जाता है. इतना ही नहीं, राजधानी रायपुर और उसके आसपास के वृक्षाच्छादित इलाकों, पुराने बगीचों तथा नदी-नालों के किनारे भी यह प्रजाति वर्षों से दर्ज की जाती रही है.
स्थानीय पक्षी प्रेमियों और बर्डवॉचर्स के रिकॉर्ड बताते हैं कि रायपुर शहर के भीतर और उसके आसपास दूधराज केवल दिखाई ही नहीं देता, बल्कि नियमित रूप से प्रजनन भी करता है. ऐसे में किसी संरक्षित क्षेत्र में इसके घोंसले का वीडियो सामने आना वैज्ञानिक दृष्टि से नई जानकारी नहीं जोड़ता.
दूधराज के नाम पर भ्रम न फैलाएं
दूधराज मुख्य रूप से कीटभक्षी पक्षी है. यह उड़ते हुए कीड़ों का शिकार करने में दक्ष होता है और इसी कारण इसे फ्लाईकैचर समूह में रखा गया है. वन पारिस्थितिकी में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विभिन्न प्रकार के कीटों की आबादी को नियंत्रित करने में योगदान देता है.
प्रजनन काल सामान्यतः अप्रैल से जुलाई के बीच माना जाता है, हालांकि स्थानीय जलवायु और वर्षा चक्र के अनुसार इसमें कुछ अंतर हो सकता है. नर और मादा दोनों घोंसला निर्माण तथा बच्चों के पालन-पोषण में भाग लेते हैं.
यह व्यवहार भारतीय उपमहाद्वीप में लंबे समय से अध्ययन का विषय रहा है और किसी भी वन क्षेत्र में इसकी नेस्टिंग को सामान्य जैविक गतिविधि माना जाता है.
रायपुर के एक पक्षी विशेषज्ञ ने सीजी खबर से कहा-उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के सामने वन्यजीव आवास संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष, जैव विविधता निगरानी, जल स्रोतों का संरक्षण और दुर्लभ प्रजातियों के दीर्घकालिक संरक्षण जैसे कई गंभीर मुद्दे मौजूद हैं. इनके बजाय सामान्य प्राकृतिक घटनाओं को उपलब्धि के रूप में प्रचारित करना संरक्षण विमर्श को सतही बना सकता है.
उन्होंने कहा- "किसी भी संरक्षित क्षेत्र की विश्वसनीयता उसके प्रचार से नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण, दीर्घकालिक निगरानी और संरक्षण परिणामों से तय होती है. यदि दूधराज की नेस्टिंग का वीडियो उपलब्ध हुआ है तो उसे क्षेत्र की जैव विविधता के एक सामान्य लेकिन सुंदर उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है. लेकिन इसे ऐसी उपलब्धि के रूप में प्रचारित करना, मानो कोई दुर्लभ या अभूतपूर्व खोज हुई हो, वैज्ञानिक तथ्यों और वास्तविकता के बीच अनावश्यक दूरी पैदा करता है."
दूधराज निस्संदेह भारत के सबसे आकर्षक पक्षियों में से एक है. उसकी उपस्थिति किसी भी वन क्षेत्र के लिए सुखद संकेत है, लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह कोई नई कहानी नहीं है. नई बात तब होगी जब संरक्षण प्रबंधन उन मुद्दों पर ठोस जानकारी साझा करे, जो वास्तव में राज्य की जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण की दिशा तय करते हैं. लेकिन हर पक्षी, पत्ते को खबर बना देने में जुटा उदंती सीतानदी टाइगर रिजर्व का प्रबंधन, असली बात बताने के बजाय, लोगों को गुमराह करते हुए, खबरें प्रचारित करने का काम करता है.