बस्तर पंडुम का सर्व आदिवासी समाज ने किया विरोध
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आयोजित बस्तर पंडुम का सर्व आदिवासी समाज ने किया विरोध
जगदलपुर | संवाददाताः छत्तीसगढ़ सरकार बस्तर के आदिवासियों की लोक संस्कृति और परंपराओं को प्रदर्शित करने बस्तर पंडुम का आयोजन कर रही है.
जनपद ,जिला और संभाग स्तर पर होने वाले बस्तर पंडुम की शुरुआत जनपद स्तर से हो गई है. लेकिन इस बस्तर पंडुम का सर्व आदिवासी समाज ने विरोध किया है.
समाज के लोगों का कहना है कि बस्तर पंडुम के माध्यम से आदिवासियों की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.
उनके रीति -रिवाजों से छेड़छाड़ किया जा रहा है.
उनका कहना है कि बस्तर में पंडुम का अलग ही महत्व है और आदिवासी परंपरा के अनुसार पंडुम हर ऋतु के आधार पर मनाया जाता है.
सभी पंडुम (त्यौहार) को मनाने की एक विधि होती है. जिसमें गांव के देवी धाम भी शामिल होते हैं.
राज्य सरकार द्वारा आदिवासी समाज प्रमुखों से बिना रायशुमारी के यह आयोजन किया जा रहा है. जिसका सर्व आदिवासी समाज विरोध कर रहा है.
ऋतुओं के आधार पर मनाया जाता है पंडुम
दरअसल बस्तर पंडुम में आदिवासी जनजातीय नृत्य, गीत, नाट्य, वाद्ययंत्र, पारंपरिक वेशभूषा, आभूषण, शिल्प - चित्रकला और जनजातीय व्यंजन और पारंपरिक पेय से जुड़ी प्रतियोगिता का आयोजन किया जा रहा है.
इसके अलावा बस्तर पंडुम के माध्यम से बस्तर के लोकजीवन को प्रदर्शित किया जा रहा है.
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर का कहना है कि शासन द्वारा जो पंडुम मनाया जा रहा है उसे समाज पंडुम नहीं मानता है.
इसके लिए आदिवासी समाज ने बस्तर संभाग आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर सरकारी पंडुम में गांव के देवी देवताओं को शामिल नहीं किए जाने की भी मांग की है.
प्रकाश ठाकुर का कहना है कि हर ऋतु के आधार पर आदिवासी पंडुम मनाते हैं, उसका एक निश्चित समय रहता है.
जो भी फसल उगाते हैं, उसका गांव के कुलदेवी - देवताओं को भोग लगाने के बाद ही ग्रहण करते हैं. इसे ही पंडुम कहा जाता है.
आदिवासी समाज का कहना है कि शासन द्वारा इन रीति रिवाजों को प्रदर्शनी के माध्यम से पेश कर आस्था व परंपराओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है.
जिसका समाज विरोध कर रहा है और इस सरकारी पंडुम में समाज के लोगों को शामिल नहीं होने के लिए भी कहा गया है.
तीन स्तर पर हो रहा आयोजन
दरअसल बस्तर पंडुम में स्पर्धा तीन चरणों में की जा रही है.
इसके लिए जनपद स्तरीय प्रतियोगिता 12 मार्च से शुरू हो गई है, जो 20 मार्च तक चलेगी.
इसके अलावा जिला स्तरीय प्रतियोगिता 21 मार्च से 23 मार्च और संभाग स्तरीय प्रतियोगिता जो कि दंतेवाड़ा में 1 अप्रैल से 3 अप्रैल तक संपन्न होगी.
एक तरफ जहां शासन - प्रशासन इसके लिए जोर-शोर से प्रचार प्रसार कर रहा है. वहीं दूसरी तरफ आदिवासी समाज ने इसका विरोध किया है.
भव्य तरीके से मनाने की तैयारी- कलेक्टर
इस मामले में बस्तर के कलेक्टर हरीश.एस का कहना है कि पंडुम शुरू होने से पहले समाज के लोगों के साथ बैठक की गई थी.
बस्तर पंडुम में सिर्फ आदिवासी कल्चर की प्रदर्शनी की जा रही है.
आदिवासियों की आस्था के साथ किसी तरह का खिलवाड़ ना हो इसका भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है.
कोशिश की जा रही है कि बस्तर पंडुम के माध्यम से आदिवासियों की परंपरा, रीति - रिवाज को लोगों को दिखाया जा सके.
जिसके लिए पुरस्कार भी रखा गया है. पुरस्कार वितरण के लिए प्रशासनिक अधिकारियों के साथ-साथ आदिवासी समाज के वरिष्ठ मुखिया ,पुजारी और अनुभवी कलाकारों को भी आमंत्रित किया गया है.
कलेक्टर का कहना है कि बस्तर पंडुम बस्तर में शांति स्थापित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा. इस वजह से शासन द्वारा इसे भव्य तरीके से मनाने की कोशिश की जा रही है.