दवाओं की किल्लत से जूझ रहा टीबी मुक्त अभियान
छत्तीसगढ़ दवाओं की किल्लत से जूझ रहा टीबी मुक्त अभियान
जगदलपुर/सरगुजा | संवाददाताः छत्तीसगढ़ के बस्तर को साल 2025 तक टीबी मुक्त बस्तर बनाने का प्रशासन ने लक्ष्य रखा है. इसके लिए टीबी हारेगा बस्तर जीतेगा का नारा देते हुए अभियान की शुरुआत की गई थी.
लेकिन प्रशासन का यह लक्ष्य पूर्ण होता दिखाई नहीं दे रहा है. क्योंकि पिछले तीन महीने में यहां 200 से अधिक मरीज मिले हैं. जबकि 1300 से अधिक मरीजों का उपचार पहले से ही चल रहा है. वहीं दवाओं की किल्लत से पीड़ित मरीज परेशान हो रहे हैं.
विश्व टीबी दिवस पर आज एक बार फिर पूरा देश टीबी बीमारी को साल 2025-26 तक खत्म करने के संकल्प को दोहरा रहा है.
बस्तर में सरकार टीबी के मरीजों की जांच और उपचार के लिए विशेष अभियान चला रही है.
शहर से लेकर गांव तक टीबी से संक्रमित मरीजों को ढूंढने और उनके इलाज का उचित इंतजाम करने का प्रयास प्रशासन द्वारा किया जा रहा है.
तीन महीने में मिले 200 नए मरीज
जिला स्वास्थ्य विभाग द्वारा कुछ दिन पहले ही इस अभियान को तेज करते हुए टीबी संक्रमित मरीजों की जांच तेज की थी.
इस दौरान पिछले तीन माह के अंदर ही 200 से अधिक नए मरीज सामने आए हैं. जबकि जिले में पहले से ही 1300 से अधिक मरीजों का उपचार चल रहा है.
दूसरी ओर जिला अस्पतालों और टीबी केन्द्रों में इन दिनों दवा की कमी मरीजों की मुश्किलें बढ़ा दी है.
टीबी संक्रमित मरीजों का कहना है कि पिछले कुछ समय से पर्याप्त दवाई का वितरण नहीं किया जा रहा है. जिसके चलते मरीजों को बार-बार अस्पतालों का चक्कर लगाना पड़ रहा है.
बताया गया कि एक सप्ताह से 15 दिनों की दवा दी जा रही है. जबकि पहले एक बार में एक माह के लिए दवा दी जाती थी. कई बार तो बगैर दवा लिए ही वापस लौटना पड़ता है.
बार-बार दवा के लिए अस्पताल आने से मरीजों का आर्थिक नुकसान भी हो रहा है.
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि दवाओं की आपूर्ति में देरी शासन स्तर पर हो रही है. प्रमुख दवाएं पर्याप्त मात्रा में केन्द्रों में उपलब्ध नहीं होने से मजबूरी में मरीजों को कम मात्रा में दवा का वितरण करना पड़ता है. जिसके चलते मरीजों को बार-बार आना पड़ता है.
इस स्थिति को शीघ्र नहीं सुधारा जाएगा तो स्थिति और खराब होती जाएगी. जबकि स्थानीय स्तर पर दवा खरीदी के लिए पर्याप्त बजट है. इसके बाद भी अधिकारियों द्वारा दवाओं की खरीदी नहीं की जाती है.
साल 2019 के आंकड़ों के हिसाब से 1550 टीबी के मरीजों की पहचान की गई थी. जिसके बाद स्वास्थ विभाग के अभियान से 2 सालों में थोड़ी कमी आई और साल 2021 के आंकड़ों पर गिरावट देखी गई. 1213 मरीजों की पहचान 2021 में की गई थी.
बस्तर में साल 2024 के पहले 5 महीनों में 13, 264 नए मामले सामने आए हैं.
सरगुजा में 6 सालों में 205 की मौत
इधऱ छत्तीसगढ़ के सरगुजा में टीबी की बीमारी को लेकर लगातार अभियान चलाने के बाद भी इसकी रोकथाम होते दिखाई नहीं दे रही है. पिछले कुछ सालों में क्षय रोगियों से पीड़ितों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है.
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार साल 2019 से साल 2024 तक कुल 6 हजार 660 मरीज इसकी चपेट में आए हैं. जिनमें से 205 लोगों की मौत हो चुकी है. चिंताजनक बात ये है कि मरने वालों में 20 से 30 साल के युवा भी शामिल हैं. जबकि वर्तमान में 1 हजार 7 सौ मरीज अभी भी पीड़ित हैं.
सरगुजा जिले में टीबी के मरीजों की संख्या और बढ़ते मौत के आंकड़ों को देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम के तहत टीबी के मरीजों की जांच और उपचार के लिए विशेष अभियान चला रही है.
स्वास्थ्य विभाग द्वारा जिले के साथ ही संभागवार घर-घर जाकर टीबी के मरीजों की पहचान की जा रही है. टीबी मरीजों की जांच के लिए पैथोडिटेक्ट यानी आरटीपीसीआर मशीन लगाई गई है.
यह मशीन छत्तीसगढ़ में पहली बार सरगुजा में लगाई गई है. वहीं घरों में जाकर छोटी एक्स-रे मशीनों की माध्यम से लोगों की छाती का एक्स-रे करके बीमारी का पता लगाया जा रहा है.
2024 में 1300 से अधिक मरीज मिले
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक साल 2024 में सरगुजा में 1300 से अधिक क्षय रोग से पीड़ित मरीज पाए गए हैं. इनमें से 11 लोगों की उपचार के दौरान मौत हो गई.
वहीं पिछले 6 सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2019 से वर्ष 2024 तक कुल 6 हजार 660 मरीज पाए गए हैं.
इनमें से 205 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें अधिकांश कम उम्र के लोग हैं. इन मरीजों में टीबी की पहचान होने के बाद उपचार के लिए बहुत ही कम समय मिला और उनकी मौत हो गई.
कम उम्र के लोग भी हो रहे पीड़ित
स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक एक 23 वर्षीय युवती में टीबी बीमारी के लक्षण पाए गए थे. युवती का तत्काल उपचार भी शुरू किया गया. कुछ दिनों में ही युवती ठीक होने लगी. खांसी, बुखार और कमजोरी की जो शिकायत थी वह भी ठीक होने लगी.इसके कुछ दिनों बाद ही मरीज के शरीर में अचानक दर्द बढ़ गया.
युवती ने स्थानीय चिकित्सकों को दिखाया. डॉक्टर ने टीबी की दवा बन्द करने की सलाह दी तो युवती ने दवा बंद कर दी. इससे खांसी में खून आने व सांस लेने में दिक्कत की परेशानी बढ़ गई.
तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर युवती को प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती किया गया. यहां भी हालत में सुधार न होने पर रायपुर एम्स रेफर कर दिया गया, लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया.
इसी प्रकार सूरजपुर में दो और मामले सामने आए थे. जिसमें एक 18 साल के युवक और एक 26 साल की युवती की टीबी के कारण मौत हो गई.
युवक के गले में गठान हो गया था. युवक ने समय पर उपचार नहीं कराया जिसके चलते टीबी युवक के स्पाइन में पहुंच गया और रीढ़ की हड्डी गल गई.
इससे युवक को पैरालिसिस हो गया और उसकी मौत हो गई. वहीं महिला कोमा में चली गई थी.