अरपा नदी में गिर रहा 40% गंदा पानी, HC में सरकार का कबूलनामा
बिलासपुर । संवाददाता: बिलासपुर शहर के सीवेज प्रबंधन और अरपा नदी के लगातार बढ़ते जल प्रदूषण को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में एक महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायाधीश रवींद्र कुमार अग्रवाल की पीठ के समक्ष राज्य सरकार ने शहर के गंदे पानी के शोधन को लेकर वास्तविक स्थिति पेश की.
वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज कुमार पिंगुआ द्वारा दायर शपथपत्र में शासन ने स्वीकार किया कि शहर से रोजाना निकलने वाले 72.20 एमएलडी सीवेज में से लगभग 28.30 एमएलडी (करीब 40 प्रतिशत) पानी बिना किसी उपचार के सीधे अरपा नदी में समा रहा है. इस स्थिति से नदी के अस्तित्व और पर्यावरण संरक्षण पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
वर्तमान में बिलासपुर में 78 एमएलडी की स्थापित क्षमता वाले चार सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) मौजूद हैं, लेकिन तकनीकी और परिचालन संबंधी सीमाओं के कारण इनमें से केवल 43.90 एमएलडी सीवेज का ही शोधन हो पा रहा है.
शहर के 70 छोटे-बड़े नालों के जरिए सीवेज संयंत्रों तक पहुँचने के साथ-साथ कई जगहों पर सीधे नदी में गिर रहा है. इस कम उपयोगिता को देखते हुए नगरीय प्रशासन विभाग एक नई तकनीकी कार्ययोजना पर काम कर रहा है, ताकि शहर के शत-प्रतिशत गंदे पानी को शोधित करने के बाद ही नदी में बहाया जाए.
भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार ने अदालत को सूचित किया कि वर्ष 2026 तक बिलासपुर नगर निगम क्षेत्र की आबादी लगभग 6.68 लाख पहुंचने का अनुमान है. सीवेज समस्या से निपटने के लिए मंगला में 16 एमएलडी क्षमता के दो नए एसटीपी तैयार किए जा रहे हैं.
इसमें 6 एमएलडी क्षमता वाले मंगला-डी प्लांट का निर्माण पूरा हो चुका है और ट्रायल रन जारी है, जबकि 10 एमएलडी वाले मंगला-बी संयंत्र का 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है. इन दोनों नए संयंत्रों के पूरी तरह शुरू होने के बाद शहर की कुल शोधन क्षमता बढ़कर 94 एमएलडी हो जाएगी, जिससे अरपा को प्रदूषण मुक्त बनाने में बड़ी मदद मिलेगी.