'12 सालों का नुकसान और 1977 का पछतावा': सोनिया गांधी के बयानों से गरमाई देश की राजनीति
"देश की लोकतंत्र और संस्थाओं को भारी नुकसान पहुंचा है" – बीजेपी सरकार के 12 सालों के कार्यकाल पर सोनिया गांधी का बड़ा बयान. इमरजेंसी पर भी रखी अपनी बात.
नई दिल्ली । डेस्क: कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के हालिया बयानों ने देश के राजनीतिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है. राष्ट्रीय दैनिक 'द हिंदू' को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में सोनिया गांधी ने भारतीय जनता पार्टी के पिछले 12 सालों के शासनकाल पर तीखा हमला बोला है. उनकी संस्मरण 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' के 10 नवंबर को वैश्विक विमोचन से ठीक पहले आए इस साक्षात्कार में उन्होंने दावा किया कि लोग अब बीजेपी सरकार के तहत देश, लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं को पहुंचे गहरे नुकसान को पहचानने लगे हैं और उनमें अब बेचैनी बढ़ रही है.
सोनिया गांधी ने इंटरव्यू में कहा कि पिछले बारह वर्षों में देश के ताने-बाने और लोकतांत्रिक प्रणालियों को बहुत नुकसान पहुंचाया गया है. इस सरकार के जाने के बाद भी हमारी व्यवस्थाओं को वापस पटरी पर लाने में काफी समय और राजनीतिक दलों के बड़े प्रयासों की आवश्यकता होगी.
उन्होंने कहा कि भले ही विरोधी दल यह मानते हों कि कांग्रेस का दबदबा खत्म हो चुका है, लेकिन वह इतनी निराशावादी नहीं हैं. उन्हें पूरा विश्वास है कि 2029 के अगले लोकसभा चुनावों में जब जनता बीजेपी को सत्ता से बाहर करेगी, तब देश में नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर एक उचित शासन प्रणाली की वापसी होगी.
'इमरजेंसी और आज के दौर की तुलना'
साक्षात्कार में सोनिया गांधी ने देश में लगाए गए 1975 के आपातकाल (इमरजेंसी) पर भी अपनी बात रखी. उन्होंने उस दौर की बिगड़ती परिस्थितियों का जिक्र करते हुए कहा कि हिंसक विरोध प्रदर्शन, सरकारी संपत्तियों में आगजनी और सेना तथा नौकरशाही को आदेश न मानने के आह्वान जैसी परिस्थितियों से इंदिरा गांधी जूझ रही थीं. हालांकि, उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इंदिरा गांधी ने खुद हालात को समझा, मार्च 1977 में चुनाव कराए और बाद में इमरजेंसी के दौरान हुई अतिशयता के लिए सार्वजनिक रूप से खेद व्यक्त करते हुए माफी भी मांगी थी. उन्होंने बल देकर कहा कि इमरजेंसी का फैसला अंततः लोकतांत्रिक तरीकों से ही हल किया गया था.
सोनिया गांधी के इस बयान पर केंद्र सरकार और बीजेपी के मंत्रियों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है. केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने सोनिया गांधी से सवाल किया कि क्या उन्हें 1975 का वह दौर याद नहीं है जब लोकतंत्र का गला घोंटा गया था, नेताओं को जेलों में डाला गया था और पत्रकारों की आवाज बंद कर दी गई थी.
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों में भारत को विश्व पटल पर 'लोकतंत्र की जननी' के रूप में मजबूती मिली है. वहीं केंद्रीय कपड़ा मंत्री गिरिराज सिंह ने भी पलटवार करते हुए कहा कि यह वही कांग्रेस है जिसने देश पर इमरजेंसी थोपी थी और लोगों की आवाज दबाई थी.
कांग्रेस नेता ने अपनी बात रखते हुए आरोप लगाया कि बीजेपी सरकार के सत्ता में आने के बाद से विपक्षी दलों को समान अवसर नहीं मिल रहे हैं. उन्होंने मीडिया पर नियंत्रण, धनबल और धर्म के इस्तेमाल के साथ-साथ चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र संस्थाओं पर पूरी तरह से शिकंजा कसने का आरोप लगाया. सोनिया गांधी ने कहा कि हाल के महीनों में यह साबित हुआ है कि कई चुनाव चुराए गए हैं और जनता अब इसके प्रति अधिक जागरूक हो चुकी है.
गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर लगातार विरोध प्रदर्शन कर रही है. कांग्रेस का दावा है कि एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार इस प्रक्रिया के फैसलों पर आधिकारिक रूप से आपत्ति दर्ज कराई थी.
'विचारधारा और राजनीतिक समझौते'
राजनीतिक समझौतों के सवाल पर सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया कि राजनीति में कभी-कभी समझौते अपरिहार्य होते हैं, लेकिन उन्होंने और उनकी पार्टी ने बीजेपी और आरएसएस के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया है और न ही कभी करेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शुरुआती जीवन और उनके चाय बेचने वाले पहलू पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि शायद उनकी पीआर टीम ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया हो, लेकिन यह सच है कि उन्होंने आरएसएस के भीतर एक वंचित पृष्ठभूमि से आकर सत्ता तक का सफर तय किया है. सोनिया गांधी ने अंत में कहा कि कांग्रेस पार्टी अलग विचारधारा से आती है और उनके पास आरएसएस से सीखने के लिए कुछ भी नहीं है.