छत्तीसगढ़ में रेप केस में सुप्रीम कोर्ट ने घटाई सज़ा
SC: बिना Penetration के रेप का आरोप टिकाऊ नहीं
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि यदि यह आरोप लगाया गया है कि किसी व्यक्ति ने नाबालिग लड़की के निजी अंगों को छुआ है, तो बलात्कार और प्रवेशी यौन हमले के लिए उसकी सजा को बनाए रखना संभव नहीं है.
10 सितंबर को न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और ज्योमल्या बागची की पीठ ने यह फैसला सुनाया. पीठ ने अपीलकर्ता की सजा को संशोधित करते हुए 20 वर्ष के कठोर कारावास को घटाकर सात वर्ष की सजा में बदल दिया.
पीठ ने नोट किया कि तीनों बयानों को पढ़ने पर स्पष्ट है कि सीधा आरोप पीड़िता के निजी हिस्सों को छूने का है. ऐसे में, आईपीसी की धारा 376 एबी और पीओसीएसओ एक्ट की धारा 6 के तहत दर्ज सजा को बनाए रखा नहीं जा सकता.
पीठ ने कहा, "हम अपीलकर्ता की सजा को आईपीसी की धारा 354 और पीओसीएसओ एक्ट की धारा 10 के तहत संशोधित करते हैं. तदनुसार, अपीलकर्ता की सजा आईपीसी की धारा 354 के तहत पांच वर्ष के कठोर कारावास और धारा 10 के तहत सात वर्ष के कठोर कारावास में बदल दी जाती है. हालांकि, ये दोनों सजाएं एक साथ चलेंगी."
पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट की धारणा, जिसे हाईकोर्ट ने बरकरार रखा था, कि प्रवेशी यौन हमला हुआ था, को बरकरार नहीं रखा जा सकता. इसका कारण यह है कि न तो मेडिकल रिपोर्ट इसका समर्थन करती है और न ही पीड़िता के तीन अलग-अलग बयान या पीड़िता की मां का बयान.
यह फैसला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 2024 के फैसले के खिलाफ अपील पर सुनाया गया, जिसमें ट्रायल कोर्ट के फैसले की पुष्टि की गई थी. सुप्रीम कोर्ट ने नोट किया कि सीधा आरोप पीड़िता के निजी हिस्सों को छूने और अपीलकर्ता के निजी अंगों को छूने का था.
अपीलकर्ता के वकील ने लड़की के बयान का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पीड़िता पर वास्तविक बलात्कार नहीं हुआ क्योंकि कोई प्रवेश नहीं था. वकील ने जोर दिया कि पीओसीएसओ एक्ट की धारा 6 भी लागू नहीं होती क्योंकि कोई प्रवेशी यौन हमला नहीं था.
हालांकि, राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि अदालत को अपीलकर्ता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं दिखानी चाहिए, क्योंकि उसने 12 वर्ष की लड़की पर अपराध किया.