हसदेव विवाद: SC करेगा वन अधिकारों की समीक्षा, PEKB खदान में खनन जारी रहेगा
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र स्थित एक गांव के आदिवासी निवासियों के सामुदायिक वन अधिकारों से जुड़ी कानूनी चुनौती पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की है. हालांकि, शीर्ष अदालत ने यह साफ कर दिया है कि इस सुनवाई के दौरान निकटतम कोयला खदान में जारी खनन कार्य पर कोई रोक नहीं लगेगी और परिचालन पूर्ववत चलता रहेगा.
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, छत्तीसगढ़ राज्य सरकार, राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) और सरगुजा जिला स्तरीय वन अधिकार समिति को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. यह आदेश हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति और छह व्यक्तिगत याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर अपील पर आया है.
न्यायिक समीक्षा का दायरा और वर्तमान स्थिति
मामले की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत यह जांच करेगी कि इस मामले में कानूनी रूप से सामुदायिक वन अधिकार अस्तित्व में हैं या नहीं. यदि ऐसे अधिकारों की मान्यता पाई जाती है, तो उनके प्रवर्तन और संरक्षण के लिए कानूनी उपायों पर विचार किया जाएगा. याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह की दलीलों को सुनने के बाद, पीठ ने पुष्टि की कि इन कानूनी पहलुओं की जांच से RRVUNL द्वारा पारसा ईस्ट और केटे बासेन (PEKB) कैप्टिव कोल ब्लॉक में किए जा रहे खनन कार्यों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.
हाईकोर्ट के फैसले को दी गई है चुनौती
सुप्रीम कोर्ट में दायर यह याचिका छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 21 अप्रैल के उस फैसले के खिलाफ है, जिसमें घाटबर्रा गांव के सामुदायिक वन अधिकारों को रद्द करने और PEKB के चरण-2 (Phase-II) खनन की स्वीकृतियों के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया गया था. हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2025 के एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा था कि यह याचिका उन कानूनी मुद्दों को अप्रत्यक्ष रूप से चुनौती देने का प्रयास है जो पूर्व मुकदमों में अंतिम रूप ले चुके हैं.
क्या है पूरा मामला?
मुख्य रूप से आदिवासी आबादी वाले घाटबर्रा गांव को पूर्व में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत कानूनी अधिकार दिए गए थे, जिससे ग्रामीणों को अपनी पारंपरिक वन भूमि के संरक्षण और प्रबंधन का अधिकार मिला था. दूसरी ओर, PEKB कोयला ब्लॉक राजस्थान की विद्युत उत्पादन कंपनी (RRVUNL) को बिजली उत्पादन के लिए आवंटित किया गया है. इसके पहले चरण (Phase-I) का खनन पूरा हो चुका है, जबकि दूसरे चरण को फरवरी 2022 में नियामक मंजूरियां मिली थीं.
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि सामुदायिक अधिकारों को रद्द करना और वन भूमि हस्तांतरण की अनुमति देना वन अधिकार अधिनियम का उल्लंघन है, क्योंकि इसके लिए ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति नहीं ली गई. साथ ही याचिका में यह भी कहा गया है कि वनों की कटाई से होने वाले सांस्कृतिक और पारिस्थितिक नुकसान की भरपाई केवल आर्थिक मुआवजे से नहीं की जा सकती.