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गंगा सूखने की कगार पर: भारत की जीवनरेखा पर संकट, समय कितना बचा है?

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28 सित. 2025, 01:32 AM 3 मिनट में पढ़ें 2

गंगा नदी
गंगा नदी

नई दिल्ली । डेस्क: भारत की जीवनरेखा कहलाने वाली गंगा नदी आज एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है. हालिया शोध के अनुसार, गंगा पिछले 1,300 वर्षों में सबसे गंभीर सूखे की स्थिति का सामना कर रही है. वैश्विक तापमान में वृद्धि के साथ, आने वाले समय में नदी के जलप्रवाह में और बड़े बदलाव हो सकते हैं, जिसका सीधा असर भारत, नेपाल और बांग्लादेश की जल सुरक्षा, कृषि और बिजली उत्पादन पर पड़ेगा.


आईआईटी गांधीनगर के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में मॉनसून एशिया ड्रॉट एटलस और प्राचीन जलवायु रिकॉर्ड का उपयोग कर 700 ईस्वी से 2012 तक गंगा के जलप्रवाह का इतिहास पुनर्निर्माण किया गया. 

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यह अध्ययन एक अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशित हुआ है. अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि हाल के दशकों में, विशेष रूप से 1991 से 2020 के बीच, नदी का प्रवाह नाटकीय रूप से कम हुआ है.


आईआईटी गांधीनगर के प्रोफेसर विमल मिश्रा ने कहा, “1990 के दशक से गंगा का प्रवाह गंभीर रूप से कम हो रहा है. इस दौरान प्रवाह की कमी 16वीं शताब्दी के सबसे बड़े सूखे की तुलना में 76 प्रतिशत अधिक थी. इतनी असामान्य शुष्कता केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं हो सकती; मॉनसून पैटर्न में बदलाव और मानवजनित गतिविधियों का संयुक्त प्रभाव इसके पीछे है.”


इस बदलाव का प्रभाव पहले ही स्पष्ट हो चुका है. 2015 से 2017 के बीच गंगा के मध्य और निचले हिस्सों में जलस्तर ऐतिहासिक रूप से सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया था, जिससे पेयजल आपूर्ति, बिजली उत्पादन, सिंचाई और नौवहन में भारी समस्याएं उत्पन्न हुईं. इससे 12 करोड़ से अधिक लोग सीधे प्रभावित हुए.


आश्चर्यजनक रूप से, यह शोध हाल के जलवायु मॉडलों की भविष्यवाणियों को चुनौती देता है. कई मॉडल ग्लोबल वार्मिंग के साथ जलप्रवाह में वृद्धि की बात कहते हैं, लेकिन वास्तव में गंगा बेसिन में प्रवाह लगातार कम हो रहा है. वैज्ञानिकों का मानना है कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के बदलते वर्षा पैटर्न इस क्षेत्र की जल आपूर्ति पर सबसे बड़ा प्रभाव डालेंगे.


2024 में आईआईएसईआर भोपाल के एक अध्ययन में पाया गया कि 1960 के बाद से गंगा बेसिन में अचानक तीव्र वर्षा की प्रवृत्ति बढ़ी है, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ गया है. 


हालांकि, कुल वर्षा की मात्रा कम हुई है, खासकर पूर्वी भारत के इंडो-गंगा मैदानों और दक्षिणी उप-बेसिनों (चंबल, बेतवा, टोंस, सोन आदि) में. दूसरी ओर, हिमालय से सटे ऊपरी गंगा और यमुना बेसिन में वर्षा और इसकी स्थिरता दोनों बढ़ी हैं.


इसके अलावा, 2015 में आईआईटीएम पुणे के एक शोध में सामने आया कि भारतीय महासागर का तेजी से गर्म होना और भूमि की तुलना में धीमी गर्मी मॉनसून की कमजोरी का कारण बन रही है. 


इससे भूमि-समुद्र तापमान का अंतर कम हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप मध्य-पूर्व और उत्तर भारत में ग्रीष्मकालीन वर्षा कम हो रही है. कुल मिलाकर, नदी बेसिन अभूतपूर्व शुष्कता का सामना कर रहा है.


वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि दक्षिण-पश्चिम मॉनसून-जो गंगा बेसिन की 75 प्रतिशत से अधिक वर्षा प्रदान करता है-का भविष्य अनिश्चित है. इसलिए, गंगा के प्रवाह में कमी के वास्तविक कारणों का पता लगाना और प्रभावी जल संसाधन प्रबंधन शुरू करना अब सबसे जरूरी है.


मॉनसून को प्रभावित करने वाले जलवायु पैटर्न, मानवजनित गतिविधियां, एयरोसोल उत्सर्जन और सिंचाई-सभी को जलवायु मॉडलों में शामिल करना होगा. तभी हम भविष्य के लिए सटीक भविष्यवाणी कर सकते हैं और गंगा जैसे महत्वपूर्ण जल संसाधन की रक्षा कर सकते हैं.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP