प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से सोना खरीदने से मना क्यों किया?
नई दिल्ली । डेस्क: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की आर्थिक सुरक्षा और विदेशी मुद्रा भंडार को संभावित संकट से बचाने के लिए नागरिकों से एक साल तक सोना न खरीदने की एक विशेष और दूरदर्शी अपील की है. इस कदम के पीछे का मुख्य उद्देश्य भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ रहे भारी दबाव को कम करना है.
वर्तमान में पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है, जिसके लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है.
तेल के साथ-साथ सोना भारत के आयात बिल का दूसरा सबसे बड़ा हिस्सा है. सरकार की चिंता यह है कि यदि सोने का आयात इसी गति से जारी रहा, तो देश के विदेशी मुद्रा भंडार में बड़ी गिरावट आ सकती है, जो किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए जोखिम भरा संकेत है.
आंकड़ों के नजरिए से देखें तो भारत दुनिया में सोने के सबसे बड़े खरीदारों में से एक है. भारतीय समाज में शादी-ब्याह और त्योहारों पर सोना खरीदने की गहरी परंपरा है, जिसके कारण देश में हर साल 700 से 800 टन सोने की खपत होती है.
हालांकि, भारत में सोने का घरेलू उत्पादन न के बराबर है, जिससे मांग का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है. वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने लगभग 7200 करोड़ डॉलर (करीब 6 लाख करोड़ रुपये) का सोना आयात किया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 24 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्शाता है.
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि सोने का आयात औद्योगिक उत्पादन या रोजगार सृजन में सीधा योगदान नहीं देता, बल्कि यह देश की पूंजी को बाहर भेज देता है.
पीएम मोदी ने नागरिकों से आग्रह किया है कि वे देशहित को सर्वोपरि रखते हुए कम से कम एक साल के लिए सोने के आभूषणों की खरीद को स्थगित कर दें. उन्होंने याद दिलाया कि इतिहास में संकट के समय भारतीयों ने अपनी इच्छा से सोना दान किया है, लेकिन आज के समय में केवल खरीद पर नियंत्रण पाकर भी देश की आर्थिक नींव को मजबूत किया जा सकता है.
मई 2026 के शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार पहले ही दबाव में है और इसमें गिरावट दर्ज की गई है. इस दबाव को कम करने के लिए नीति निर्माताओं का मानना है कि 'गैर-जरूरी' आयात, जैसे कि सोना, पर लगाम लगाना सबसे प्रभावी तरीका है.
दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री की औपचारिक अपील से पहले ही बाजार में सकारात्मक बदलाव दिखने लगे हैं और आयात में कमी दर्ज की गई है. सरकार का मानना है कि यदि जनता इस संकल्प में साथ देती है, तो भारत चुनौतीपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद अपनी आर्थिक संप्रभुता और मुद्रा की स्थिरता को बनाए रखने में सक्षम होगा.