मीठे पेय और शराब पर टैक्स बढ़ाने की WHO ने की अपील
जिनेवा । डेस्क: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने सरकारों से मीठे शीतल पेय पदार्थों और शराब पर करों में उल्लेखनीय वृद्धि करने का आह्वान किया है. संगठन ने चेतावनी दी है कि कमजोर और अपर्याप्त कर प्रणालियों के कारण ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक उत्पाद लगातार सस्ते होते जा रहे हैं, जबकि इनके सेवन से जुड़ी बीमारियों का बोझ स्वास्थ्य प्रणालियों पर लगातार बढ़ रहा है.
दो नई वैश्विक रिपोर्टों में WHO ने कहा कि मीठे पेय और शराब की बढ़ती सुलभता मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग, कैंसर और दुर्घटनाओं जैसी रोकी जा सकने वाली गैर-संचारी बीमारियों (NCDs) और चोटों को तेजी से बढ़ावा दे रही है. इसका सबसे अधिक असर बच्चों और युवाओं पर पड़ रहा है, जो इन उत्पादों के प्रमुख उपभोक्ता बनते जा रहे हैं.
WHO के महानिदेशक डॉ. टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयेसस ने कहा, “स्वास्थ्य टैक्स बीमारियों की रोकथाम और जनस्वास्थ्य को बढ़ावा देने के सबसे प्रभावी औजारों में से एक हैं. तंबाकू, मीठे पेय और शराब जैसे उत्पादों पर टैक्स बढ़ाकर सरकारें न केवल इनके हानिकारक सेवन को कम कर सकती हैं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए आवश्यक संसाधन भी जुटा सकती हैं.”
रिपोर्ट में बताया गया है कि मीठे पेय और शराब का वैश्विक बाजार अरबों डॉलर का है, जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारी मुनाफा होता है. इसके बावजूद सरकारें स्वास्थ्य टैक्स के माध्यम से इस मुनाफे का केवल एक छोटा हिस्सा ही वसूल पाती हैं, जबकि दीर्घकालिक स्वास्थ्य और आर्थिक नुकसान का भार समाज को उठाना पड़ता है.
WHO के अनुसार, वर्तमान में कम से कम 116 देश मीठे पेय पदार्थों पर टैक्स लगाते हैं, जिनमें अधिकतर कार्बोनेटेड सॉफ्ट ड्रिंक्स शामिल हैं. हालांकि, कई उच्च-शर्करा वाले उत्पाद जैसे 100 प्रतिशत फलों के रस, मीठे दूध पेय, रेडी-टू-ड्रिंक कॉफी और चाय अब भी कर के दायरे से बाहर हैं. वहीं 97 प्रतिशत देश एनर्जी ड्रिंक्स पर टैक्स लगाते हैं, लेकिन इस आंकड़े में 2023 के बाद कोई सुधार नहीं हुआ है.
शराब पर अलग से जारी WHO रिपोर्ट में बताया गया है कि कम से कम 167 देश शराब पर कर लगाते हैं, जबकि 12 देशों में शराब पूरी तरह प्रतिबंधित है. इसके बावजूद 2022 के बाद से अधिकांश देशों में शराब की वास्तविक कीमतें या तो घट गई हैं या स्थिर बनी हुई हैं, क्योंकि कर दरें महंगाई और आय में वृद्धि के अनुरूप नहीं बढ़ाई गईं.
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि यूरोप के कई देशों सहित कम से कम 25 देशों में अब भी वाइन पर कोई टैक्स नहीं लगता, जबकि इसके स्वास्थ्य जोखिम स्पष्ट रूप से स्थापित हैं.
WHO ने कहा कि जहां उद्योग लगातार मुनाफा कमा रहा है, वहीं आम जनता को इसके स्वास्थ्य दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं और सरकारों को इलाज पर भारी खर्च उठाना पड़ता है.
इसी पृष्ठभूमि में WHO ने अपनी नई ‘3 बाय 35’ पहल की घोषणा की है, जिसके तहत 2035 तक तंबाकू, शराब और मीठे पेय पदार्थों की वास्तविक कीमतों में वृद्धि कर उन्हें कम सुलभ बनाने का लक्ष्य रखा गया है.
संगठन का मानना है कि मजबूत और प्रभावी स्वास्थ्य कर नीति से न केवल बीमारियों को रोका जा सकता है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को आर्थिक रूप से भी सशक्त किया जा सकता है.
बता दें कि भारत में मीठे पेय और शराब पर टैक्स की स्थिति अलग-अलग है. शक्करयुक्त और कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स, फ्लेवर्ड एवं एनर्जी ड्रिंक्स को केंद्र सरकार ने स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हुए “सिन गुड्स” की श्रेणी में रखा है और इन पर 40 प्रतिशत GST लगाया जाता है, जो पहले 28 प्रतिशत GST और सेस मिलाकर लगभग इसी स्तर का था.
जबकि 100 प्रतिशत फलों के जूस, प्लांट-बेस्ड दूध और कुछ गैर-कार्बोनेटेड स्वास्थ्य पेयों पर अपेक्षाकृत कम, लगभग 5 प्रतिशत GST लागू है.
इसके विपरीत शराब GST के दायरे से बाहर है और उस पर कर लगाने का अधिकार राज्यों के पास है, इसलिए हर राज्य अपनी अलग-अलग एक्साइज ड्यूटी, वैट और अन्य शुल्क लगाता है, जिससे शराब की कीमतें राज्यों में काफी भिन्न होती हैं. यही कारण है कि भारत में मीठे पेयों पर केंद्र स्तर पर ऊँचा कर है, जबकि शराब पर टैक्स व्यवस्था राज्य-स्तर पर बंटी हुई और असमान है.