नेपाल की नई सरकार की विदेश नीति क्या होगी?
नई दिल्ली । डेस्क: काठमांडू से प्राप्त संकेतों के अनुसार, यदि आगामी राजनीतिक समीकरण योजना के अनुरूप रहे, तो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) अगले दो सप्ताह के भीतर नेपाल में एक बहुमत वाली सरकार का गठन कर सकती है. इस संभावित सत्ता परिवर्तन ने न केवल नेपाल के भीतर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में भी एक बड़ी हलचल पैदा कर दी है. सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली यह नई सरकार जिसका प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह का बनना तय माना जा रहा है भारत, चीन और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों के प्रति क्या रुख अपनाएगी.
पार्टी अध्यक्ष लामिछाने ने स्पष्ट किया है कि उनकी सरकार एक "संतुलित और स्वतंत्र" विदेश नीति पर चलेगी, जिसका मुख्य केंद्र "विकास कूटनीति" होगा. हालांकि, भू-राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि अनुभवहीनता और वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते तनाव के कारण यह रास्ता अत्यंत चुनौतीपूर्ण होगा.
पूर्व विदेश मंत्रियों का तर्क है कि नेपाल वर्तमान में एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ वह अपनी विदेश नीति में किसी भी बड़े 'रीसेट' या अस्थिरता का जोखिम नहीं उठा सकता. प्राथमिकताएं बदल सकती हैं, लेकिन बुनियादी विदेश नीति को स्थिर रखना ही नेपाल के हित में होगा.
चीन के संदर्भ में, नई सरकार को बीजिंग का वह भरोसा फिर से जीतना होगा जो पिछले कुछ समय से डगमगाया हुआ है. आरएसपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती 'बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव' (बीआरआई) परियोजनाओं के कार्यान्वयन को लेकर होगी. चीन लंबे समय से नेपाल में अपनी सुरक्षा और सभ्यता संबंधी पहलों (जीएसआई, जीसीआई और जीडीआई) को आगे बढ़ाना चाहता है.
आरएसपी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के प्रमुख शिशिर खनाल के अनुसार, पार्टी 'एक चीन नीति' के प्रति प्रतिबद्ध है, लेकिन बीआरआई जैसे प्रोजेक्ट्स पर कोई भी फैसला निवेश मॉडल और सामाजिक-आर्थिक प्रभाव के गहन विश्लेषण के बाद ही लिया जाएगा. नई की सरकार के लिए यह संतुलन बनाना कठिन होगा कि वे चीन से आर्थिक लाभ भी लें और साथ ही किसी सुरक्षा ब्लॉक का हिस्सा दिखने से भी बचें. बीजिंग यह करीब से देख रहा है कि क्या नई सरकार चीन के प्रति पिछले कुछ महीनों की "ठंडक" को खत्म कर पाएगी या नहीं.
भारत के साथ संबंधों की बात करें तो नई सरकार को दशकों पुराने सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों की विरासत को आगे बढ़ाना होगा. लामिछाने ने भारत के साथ "पारस्परिक सम्मान" पर आधारित संबंधों की वकालत की है, लेकिन सीमा विवाद, जल संसाधन प्रबंधन और सुरक्षा चुनौतियों जैसे संवेदनशील मुद्दे उनकी कूटनीतिक कुशलता की कड़ी परीक्षा लेंगे.
भारत के लिए नेपाल में एक स्थिर और विश्वसनीय सरकार का होना रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है. आरएसपी का घोषणापत्र नेपाल को केवल एक 'बफर स्टेट' (दो शक्तियों के बीच का क्षेत्र) के बजाय एक 'वाइब्रेंट ब्रिज' (जीवंत सेतु) बनाने की बात करता है, जो भारत और चीन के बीच त्रिपक्षीय आर्थिक साझेदारी को बढ़ावा दे सके.
यदि नई सरकार इस विजन को अमली जामा पहनाने में सफल होते हैं, तो यह दक्षिण एशिया की राजनीति में एक युगांतरकारी बदलाव होगा. हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि भारत के हितों और सुरक्षा चिंताओं को नजरअंदाज करना नई सरकार के लिए संभव नहीं होगा.
अमेरिका के प्रति रुख को लेकर भी काफी उत्सुकता है. नेपाल में अमेरिकी सहायता परियोजना 'मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन' (एमसीसी) का मुद्दा पहले ही काफी विवादित रह चुका है. नई सरकार को 747 मिलियन डॉलर की इस परियोजना को सुचारू रूप से लागू करने के साथ-साथ और अधिक अमेरिकी निवेश आकर्षित करने की चुनौती का सामना करना होगा.
अमेरिका वर्तमान में दक्षिण एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ा रहा है, और नेपाल की भौगोलिक स्थिति उसे वाशिंगटन की रणनीतिक नजरों में महत्वपूर्ण बनाती है. सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों का सुझाव है कि नेपाल को 'समदूरस्थ कूटनीति' (Equidistant Diplomacy) अपनानी चाहिए ताकि वह भारत, चीन और अमेरिका के बीच चल रही वैश्विक प्रतिस्पर्धा की आग में न झुलसे.
इसके अलावा, पश्चिम एशिया के संकट के बीच लाखों नेपाली प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा, जलवायु न्याय और सार्क जैसे क्षेत्रीय संगठनों की प्रासंगिकता को बहाल करना भी विदेश नीति के प्रमुख स्तंभ होंगे. अंततः, नई सरकार की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह आंतरिक राजनीतिक सहमति बनाते हुए वैश्विक शक्तियों के प्रति एक सुर में बात कर पाती है या नहीं.