ईरान और अमेरिका में IAEA पर जुबानी जंग तेज
नई दिल्ली । डेस्क: अमेरिका और ईरान के बीच हुए हालिया अंतरिम समझौते के एक हफ्ते बाद ही दोनों देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं. संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रॉसी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि उनके निरीक्षक ईरान के परमाणु संवर्द्धन स्थलों का दौरा करेंगे. ग्रॉसी ने इस कदम को युद्ध समाप्ति और अंतरिम समझौते का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बताया है.
हालांकि, ईरान ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि ऐसी किसी भी जांच की अनुमति केवल अंतिम समझौते के बाद ही दी जाएगी. दोनों देशों के शीर्ष नेताओं द्वारा दस्तावेज की अलग-अलग व्याख्या किए जाने से क्षेत्र में लागू संघर्षविराम के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं.
परमाणु जांच पर आमने-सामने आए दोनों देश:
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के प्रमुख राफेल मारियानो ग्रॉसी ने जापान के फुकुशिमा परमाणु संयंत्र में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान दोनों देशों के बयानों को 'शब्दों का युद्ध' करार दिया. उन्होंने कहा कि दोनों देशों के राष्ट्रपतियों द्वारा हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन में साफ तौर पर लिखा है कि ईरान की परमाणु गतिविधियों की निगरानी आईएईए द्वारा की जाएगी.
ग्रॉसी ने जोर देकर कहा कि इस निगरानी को प्रभावी बनाने के लिए जांच करना अनिवार्य है, चाहे यह दो दिन बाद हो या दस दिन बाद.
दूसरी ओर, ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गारीबाबादी ने ग्रॉसी के दावों पर तीखा पलटवार किया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह मुद्दा केवल एक अंतिम समझौते के दायरे में ही तय किया जाएगा, जिसमें दूसरे पक्ष द्वारा सभी प्रतिबंधों को पूरी तरह से हटाना शामिल होगा. उन्होंने आईएईए प्रमुख पर मीडिया प्रचार के जरिए दबाव बनाने की नीति अपनाने का आरोप भी लगाया.
संवेदनशील स्थलों की स्थिति और विशेषज्ञों की चिंता:
वर्ष 2025 में ईरान और इजरायल के बीच हुए 12 दिवसीय युद्ध के बाद से ही तेहरान ने आईएईए निरीक्षकों को अपने उन संवेदनशील संवर्द्धन स्थलों पर जाने से रोक रखा है, जहाँ अत्यधिक संवर्द्धित यूरेनियम का भंडार मौजूद है. विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के पास वर्तमान में इतनी मात्रा में 60 प्रतिशत तक शुद्ध यूरेनियम मौजूद है, जिससे वह आसानी से कई परमाणु हथियार बना सकता है.
हालांकि ईरान अपने कार्यक्रम को हमेशा से शांतिपूर्ण बताता रहा है, लेकिन बिना किसी सैन्य कार्यक्रम के इस स्तर का संवर्द्धन करने वाला वह दुनिया का इकलौता देश है. आईएईए का कहना है कि इन मुख्य केंद्रों तक पहुंच के बिना वे ईरान के वास्तविक स्टॉकपाइल या सेंट्रीफ्यूज की स्थिति को सत्यापित नहीं कर सकते हैं, जिससे गैर-प्रसार विशेषज्ञों में यह डर बना हुआ है कि ईरान गुपचुप तरीके से अपनी सामग्री को अघोषित स्थानों पर स्थानांतरित कर सकता है.
क्षेत्रीय तनाव और इजरायल-लेबनान का मोर्चा:
इस कूटनीतिक रस्साकशी के बीच जमीनी स्तर पर भी तनाव कम होने का नाम नहीं ले रहा है. लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह आतंकियों और इजरायल के बीच चल रहा संघर्ष इस समझौते को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहा है. शनिवार से प्रभावी हुए संघर्षविराम के बाद इजरायल ने बुधवार को दक्षिणी लेबनान पर अपना पहला हवाई हमला किया, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई.
इजरायल के रक्षा मंत्री इजरायल काट्ज़ ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका ने उन पर लेबनान से पीछे हटने का कोई दबाव नहीं डाला है और जब तक हिजबुल्लाह से खतरा बना रहेगा, उनके सैनिक वहीं डटे रहेंगे.
वहीं हिजबुल्लाह ने इजरायली सैनिकों की पूर्ण वापसी तक अपने हमले रोकने से इनकार कर दिया है. इस उलझन को सुलझाने के लिए दोनों देशों के प्रतिनिधि वाशिंगटन में बैठक कर रहे हैं, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच अगले सप्ताह स्विट्जरलैंड के बर्गनस्टॉक में तकनीकी स्तर की वार्ता फिर से शुरू होगी, जिसमें पाकिस्तान मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है.
खाड़ी देशों के दौरे पर अमेरिकी विदेश मंत्री:
इन तेजी से बदलते घटनाक्रमों के बीच अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो खाड़ी देशों के तीन दिवसीय महत्वपूर्ण दौरे पर हैं. उन्होंने अबू धाबी में यूएई के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के साथ एक बंद कमरे में बैठक और दोपहर के भोजन पर चर्चा की.
इसके बाद रुबियो कुवैत पहुंचे, जहां ईरान युद्ध के दौरान करीब तीन महीने पहले बंद किए गए अमेरिकी दूतावास को सीमित स्तर पर फिर से खोलने की औपचारिक घोषणा की गई.
रुबियो की इस यात्रा को खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी कूटनीति को फिर से मजबूत करने और ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. 60 दिनों की दी गई समयसीमा के भीतर यदि दोनों पक्ष कूटनीतिक बारीकियों को सुलझाने में नाकाम रहते हैं, तो यह अंतरिम समझौता पूरी तरह से विफल हो सकता है.