इंद्रावती टाइगर रिजर्व में 'वन मित्र' बने जंगली भैंसों के रक्षक
रायपुर । संवाददाता: माओवादी हिंसा के साए से उबर रहे बस्तर के बीजापुर जिले से वन्यजीव संरक्षण को लेकर एक बेहद उम्मीद जगाने वाली खबर आई है. वर्षों तक जिस इंद्रावती टाइगर रिजर्व के घने जंगलों में हिंसक परिस्थितियों के कारण वन्यजीव शोधकर्ता कदम रखने से भी कतराते थे, आज वहां के स्थानीय ग्रामीण छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु और मध्य भारत के आखिरी बचे 'वनभैंसों' की जान बचाने के लिए ढाल बन गए हैं.
'वन मित्र' नामक एक विशेष कार्यक्रम के तहत स्थानीय ग्रामीणों को वन्यजीवों की निगरानी, उनके पैरों के निशान (ट्रैकिंग) और उनके प्राकृतिक आवास के आकलन का कड़ा प्रशिक्षण दिया जा रहा है. यह अनूठी पहल राज्य की गैर-सरकारी संस्था 'नोवा नेचर वेलफेयर सोसाइटी', इंद्रावती टाइगर रिजर्व प्रबंधन और 'वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन ट्रस्ट' (WCT) के संयुक्त तत्वावधान में चलाई जा रही है.
विशेषज्ञों का अनुमान है कि पूरे मध्य भारत में अब केवल 15 से 20 जंगली भैंसें ही बची हैं, जो इंद्रावती और उससे सटे महाराष्ट्र के कोलामार्का रिजर्व के जंगलों में विचरण कर रही हैं. उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व में जंगली भैंसों की संख्या घटकर महज एक रह जाने के बाद, अब इंद्रावती ही इस दुर्लभ प्रजाति का आखिरी गढ़ बन चुका है.
नोवा नेचर वेलफेयर सोसाइटी के सूरज ने बताया कि स्थानीय लोगों की भागीदारी के बिना इतने बड़े पैमाने पर संरक्षण कार्य नामुमकिन है. इन जंगलों में रहने वाले ग्रामीण यहां के चप्पे-चप्पे से वाकिफ हैं. चुनौती सिर्फ इस प्रजाति को बचाने की नहीं है, बल्कि यह समझने की भी है कि वे इस विशाल परिदृश्य में कहां और कैसे रह रहे हैं.
पिछले छह महीनों में 30 से अधिक ग्रामीणों को कैमरा ट्रैप लगाने, जीपीएस-सक्षम मोबाइल ऐप का उपयोग करने और डिजिटल फोटोग्राफी के जरिए वन्यजीवों का रिकॉर्ड रखने का प्रशिक्षण दिया जा चुका है.
प्रोजेक्ट कोआर्डिनेटर मोइज़ अहमद के अनुसार, यह कार्यक्रम ग्रामीणों के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक पद्धतियों से जोड़ता है, जिससे वनभैंसों की मौजूदगी और उनकी आवाजाही के सटीक आंकड़े मिल रहे हैं.
गौरतलब है कि मध्य भारत में जंगली भैंसों की आबादी का इतिहास काफी दर्दनाक रहा है. कभी बस्तर से लेकर उत्तरी छत्तीसगढ़ तक फैले इन शानदार जीवों को दशकों तक शिकार, जंगलों के विनाश और मानव-वन्यजीव संघर्ष की भारी कीमत चुकानी पड़ी.
कभी राजमहलों की शोभा बढ़ाने के लिए इनका शिकार हुआ, तो कभी फसलों को नुकसान पहुंचाने के कारण इन्हें मार दिया गया. विशेषज्ञों की मानें तो साल 2004 से पहले अकेले उदंती में करीब 70 जंगली भैंसें थीं, जो अब खत्म होने की कगार पर हैं.
ऐसे में अगर इंद्रावती के इन आखिरी वनभैंसों को नहीं बचाया गया, तो मध्य भारत से इस प्रजाति का मूल जीन पूल हमेशा के लिए विलुप्त हो जाएगा. File Photo