स्वामी आत्मानंद स्कूलों में पढ़ाई ठप, रायपुर में गरजे 1000 संविदा शिक्षक
अंबिकापुर । संवाददाता: प्रदेश भर के स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी और हिंदी माध्यम उत्कृष्ट विद्यालयों में शैक्षणिक कार्य पूरी तरह पटरी से उतर गया है. संविदा शिक्षकों और कर्मचारियों के हड़ताल पर जाने से कई स्कूलों में अघोषित तालाबंदी जैसे हालात बन गए हैं. इस गतिरोध की मुख्य वजह छत्तीसगढ़ स्वामी आत्मानंद संविदा शिक्षक और कर्मचारी संघ के तत्वावधान में शुरू हुआ दो दिवसीय महा-आंदोलन है.
रायपुर के तूता धरना स्थल पर आयोजित इस विरोध प्रदर्शन में अकेले सरगुजा संभाग से लगभग 1,000 शिक्षक और कर्मचारी हिस्सा लेने पहुंचे हैं, जिससे पूरे संभाग के करीब 40 स्कूलों का अध्यापन कार्य बुरी तरह प्रभावित हुआ है.
तूता धरना स्थल से आ रही तस्वीरों में शिक्षकों का दर्द साफ झलक रहा है, जहां वे अपने दुधमुंहे बच्चों को गोद में लेकर पंडालों में डटे हुए हैं. मासूमों के हाथों में थमी 'प्लीज सेव माय फ्यूचर' लिखी तख्तियां उनके परिवारों की अनिश्चितता की कहानी बयां कर रही हैं. इसके साथ ही, "शिक्षकों का सम्मान करो" और "न्यायपूर्ण वेतनमान दो" के नारों से पूरा परिसर गूंज रहा है.
संघ के प्रदेश अध्यक्ष दुर्योधन यादव के नेतृत्व में हो रहे इस आंदोलन में पांच प्रमुख मांगें रखी गई हैं. कर्मचारियों की पहली और सबसे बड़ी मांग है कि कलेक्टर की अध्यक्षता वाली समिति की व्यवस्था को खत्म कर पूरे विद्यालय और स्टाफ का संविलियन सीधे शिक्षा विभाग में किया जाए.
इसके अलावा, मध्य प्रदेश सरकार की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी संविदा नियम लागू करने, हर साल नियमानुसार वार्षिक वेतन वृद्धि (डीएमएफ से नियुक्त कर्मियों सहित) देने और ग्रंथपालों को पुनः शिक्षक ग्रंथपाल (लेवल-8) का दर्जा देने की मांग उठाई जा रही है.
सुरक्षा के दृष्टिकोण से कर्मचारियों के लिए नियमित पीएफ कटौती, स्पष्ट सेवा सुरक्षा नीति और किसी भी दुर्घटना की स्थिति में 50 लाख रुपये के जीवन बीमा कवर की मांग भी शामिल है.
गौरतलब है कि अकेले सरगुजा जिले में ही ऐसे 20 स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिनकी पूरी प्रशासनिक और शैक्षणिक व्यवस्था इन्हीं संविदा कर्मचारियों के भरोसे है.
संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि वे बीते 5 वर्षों से पूरी निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन इतने समय में उनके मानदेय में एक प्रतिशत का भी इजाफा नहीं हुआ है. कमरतोड़ महंगाई के इस दौर में सीमित आय के साथ परिवार चलाना बेहद कठिन हो गया है, जिसके चलते उन्हें मजबूरन सड़कों पर उतरना पड़ा है.