गरियाबंद के देवभोग में दूषित पानी से मौतों की आशंका, 6 वर्षो में 15 मौतें
गरियाबंद । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के गरियाबंद स्थित सुपेबेड़ा के बाद अब देवभोग ब्लॉक मुख्यालय में भी पीने के पानी की शुद्धता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. स्थानीय निवासियों का दावा है कि बीते छह वर्षों में क्षेत्र में गुर्दे (किडनी) की बीमारी के कारण 15 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है.
इस त्रासदी का सबसे ज्यादा असर नगर पंचायत के वार्ड क्रमांक 3 में देखा जा रहा है, जहां अकेले 8 लोगों की मौत की बात सामने आई है. इस स्थिति के चलते करीब 350 की आबादी वाले इस वार्ड के लोग पीने के पानी के लिए हैंडपंप और निजी बोर पर भरोसा करने के बजाय सैकड़ों मीटर दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं.
हालांकी, मौतों के कारणों और पेयजल की गुणवत्ता को लेकर स्थानीय जनता और प्रशासनिक महकमे के दावों में बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है. ग्रामीणों का आरोप है कि इलाके के निजी बोरवेल में टीडीएस (TDS) का स्तर 800 से 1200 तक पहुंच गया है, जो सेहत के लिए बेहद हानिकारक है.
वहीं इसके विपरीत, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी (PHE) विभाग के उपयंत्री बीएस सिदार का कहना है कि जन मांग पर कराई गई विभागीय जांच में टीडीएस का स्तर अधिकतम 300 मिलीग्राम पाया गया है, जो 300 से 500 की तय मानक सीमा के भीतर आता है.
दूसरी ओर, स्वास्थ्य विभाग इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है. खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) डॉ. प्रकाश साहू के अनुसार, लंबे समय तक पानी में अनचाहे तत्वों की अधिकता से पाचन और हड्डियों पर असर पड़ सकता है, लेकिन फिलहाल अस्पताल में जलजनित बीमारियों या किडनी संक्रमण के ऐसे कोई बड़े मामले दर्ज नहीं हुए हैं.
हालांकि, अपनों को खो चुके पीड़ित परिवारों का कहना है कि क्षेत्र में मौजूद सोलर पंप लंबे समय से ठप पड़ा है और प्रशासनिक शिविरों में गुहार लगाने के बावजूद जलापूर्ति की व्यवस्था सुचारू नहीं हो सकी है. ऐसे में जमीनी हकीकत का पता लगाने के लिए पानी की पारदर्शी जांच और मौतों के कारणों की विस्तृत चिकित्सीय समीक्षा की सख्त जरूरत है.