पत्नियों को मिले तलाक के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली PIL खारिज
SC की दोटूक: पत्नियों को मिले तलाक के विशेष अधिकार को चुनौती देने वाली PIL खारिज
नई दिल्ली । डेस्क: उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के एक विशिष्ट प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका पर विचार करने से साफ इनकार कर दिया. यह प्रावधान वर्तमान में केवल पत्नी को इस आधार पर तलाक की मांग करने का अधिकार देता है कि भरण-पोषण (maintenance) की डिक्री पारित होने के बाद एक वर्ष या उससे अधिक समय तक पति-पत्नी के बीच सहवास फिर से शुरू नहीं हुआ है.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने कानून के छात्र जितेंद्र सिंह द्वारा दायर इस याचिका को खारिज करते हुए कड़ी टिप्पणी की और इसे "व्यक्तिगत प्रतिशोध" साधने का जरिया बताया. सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस प्रावधान को "लैंगिक-तटस्थ" (gender-neutral) बनाया जाना चाहिए और यह पुरुषों के लिए भी उपलब्ध होना चाहिए, तो पीठ ने तीखे सवाल किए.
मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि याचिकाकर्ता इससे व्यक्तिगत रूप से कैसे प्रभावित हैं और क्या वह पूरे पुरुष वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. अदालत ने याचिकाकर्ता के इस स्वीकारोक्ति पर कि वह पिछले कई वर्षों से वैवाहिक मुकदमेबाजी में शामिल हैं, नाराजगी जताते हुए कहा कि जनहित याचिकाओं का उपयोग व्यक्तिगत रंजिश निकालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए.
न्यायमूर्ति बागची ने स्पष्ट किया कि विधायिका के पास संविधान के तहत महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून और प्रावधान बनाने की शक्ति है.
उन्होंने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता इन मामलों में पूर्ण समानता चाहते हैं, तो उन्हें संविधान में संशोधन की मांग करनी चाहिए क्योंकि यह एक विशेष कानून है. अंततः, न्यायालय ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि याचिकाकर्ता अपनी व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए इस मंच का दुरुपयोग कर रहे हैं.