सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-हसन पर कसा शिकंजा
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तलाक-ए-हसन प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताई है. इस प्रथा में पति द्वारा महीने में एक बार पत्नी को 'तलाक' शब्द उच्चारित करने से तीन महीने बाद वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाते हैं. शीर्ष अदालत ने सवाल उठाया कि क्या ऐसी प्रक्रिया संभव है और क्या आधुनिक सभ्य समाज में यह स्वीकार्य हो सकता है. जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस उज्ज्वल भुंइया और जस्टिस एन कोटेश्वर सिंह की बेंच ने इस मामले को पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ के पास भेजने का संकेत दिया है.
तलाक-ए-हसन के तहत पति तीन महीनों तक हर माह एक बार 'तलाक' कह सकता है और फिर किसी व्यक्ति, अक्सर वकील के माध्यम से, पत्नी को तलाक का नोटिस भेज सकता है. हालांकि, इस दौरान पति-पत्नी के शारीरिक संबंध बनने पर तलाक अमान्य हो जाता है.
बेंच ने इस प्रक्रिया की वैधता पर गंभीर सवाल खड़े किए. एक मामले में तलाक चाहने वाले पति के वकील को फटकार लगाते हुए जजों ने कहा, "यह कैसी प्रथा है? 2025 में आप इसे कैसे बढ़ावा दे रहे हैं? चाहे कोई भी धर्म हो, क्या हम इसे बर्दाश्त कर सकते हैं? इससे महिलाओं की गरिमा कैसे बचेगी? क्या किसी सभ्य समाज में ऐसी प्रथा चल सकती है?"
यह मामला उन मुस्लिम महिलाओं की याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आया, जिन्हें उनके पतियों ने तलाक-ए-हसन के जरिए छोड़ दिया. याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि इस प्रक्रिया से उन्हें संतान की पढ़ाई, पासपोर्ट और अन्य कानूनी मामलों में भारी परेशानियां झेलनी पड़ रही हैं.
बेंच ने इन महिलाओं की हिम्मत और अच्छे इरादे की सराहना की, साथ ही कहा कि देश के विभिन्न हिस्सों में लाखों महिलाएं ऐसी प्रथा के खिलाफ आवाज नहीं उठा पा रही हैं. अदालत का मानना है कि यदि यह समाज को व्यापक रूप से प्रभावित कर रही है, तो हस्तक्षेप जरूरी है.
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में तीन तलाक प्रथा को असंवैधानिक घोषित कर बैन कर दिया था. उस प्रथा में पति एक साथ तीन बार 'तलाक' कहने मात्र से तलाक हो जाता था, जिसे अदालत ने महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना.
अब तलाक-ए-हसन पर भी कोर्ट ने नकेल कसने का संकेत दिया है. बेंच ने राष्ट्रीय महिला आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग से भी इस पर अपनी राय मांगी है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है.
क्या है तलाक-ए-हसन
तलाक-ए-हसन का अर्थ है कि पति अपनी पत्नी को तीन बार पवित्रता (तुहर) के दौरान तीन बार तलाक दे. इसमें प्रत्येक तलाक एक अलग तुहर में दिया जाता है, अर्थात पहला तलाक एक तुहर में दिया जाएगा, फिर दूसरा तलाक अगले तुहर के बाद दिया जाएगा, और तीसरा तलाक तीसरे तुहर के बाद दिया जाएगा. यह तलाक के सुन्नत प्रकारों में से एक है.
पहला तलाक: जब महिला मासिक धर्म से गुजरती है और फिर पवित्र हो जाती है, तो इस पवित्रता के दौरान, जिसमें पति ने संभोग नहीं किया है, पति पहला तलाक देगा.
दूसरा तलाक: उसके बाद, जब अगला मासिक धर्म आता है और फिर वह पवित्र हो जाती है, तो वह इस दूसरे तुहर में दूसरा तलाक देगा.
तीसरा तलाक: जब उसके बाद तीसरा तुहर आता है, तो वह तीसरा तलाक देगा.
जब महिला मासिक धर्म चक्र या गर्भावस्था से गुजर रही हो तो तलाक नहीं दिया जा सकता.
तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) में शख्स एक बार में कई तलाक बोलता है. इसमें मियां-बीवी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं होती और शादी मौके पर ही खत्म हो जाती है. तीन तलाक पर मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत, इराक और मलेशिया जैसे कई मुस्लिम देशों में प्रतिबंध लगा दिया गया है.