SC ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के शव कब्र से निकालने पर लगाई रोक
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाई समुदाय के सदस्यों के दफन अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 4 हफ्तों में जवाब मांगा है और अंतरिम आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया है कि राज्य में किसी भी दफनाए गए ईसाई शव को जबरन कब्र से निकालकर (exhumation) कहीं और स्थानांतरित नहीं किया जाएगा.
जस्टिस विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारिया की बेंच ने यह आदेश दिया. कोर्ट ने कहा, "इस बीच, दफनाए गए शवों की कोई और उत्खनन (exhumation) की अनुमति नहीं दी जाएगी."
याचिका 'छत्तीसगढ़ एसोसिएशन फॉर जस्टिस एंड इक्वेलिटी एंड अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य' के तहत दाखिल की गई है, जिसमें दावा किया गया है कि दक्षिण छत्तीसगढ़ के कई आदिवासी इलाकों (खासकर बस्तर संभाग) में ईसाई परिवारों को गांव के सामान्य कब्रिस्तान में अपने परिजनों को दफनाने से रोका जा रहा है.
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, दफनाने के बाद शवों को बिना परिवार की सहमति के कब्र से निकालकर अज्ञात या दूरस्थ स्थानों (कभी-कभी 50 किमी से अधिक दूर) पर जबरन दफनाया जा रहा है.
सीनियर एडवोकेट कोलिन गोंसाल्वेस ने कोर्ट को बताया कि यह घटनाएं अलग-थलग नहीं हैं, बल्कि एक पैटर्न का हिस्सा हैं. याचिका में कहा गया है कि इससे मृतक और उनके परिवारों के साथ क्रूर, अमानवीय और गरिमा के विरुद्ध व्यवहार हो रहा है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है.
याचिका में आरोप है कि गांव के पारंपरिक कब्रिस्तान अब अनौपचारिक रूप से बहुसंख्यक धार्मिक समूहों तक सीमित कर दिए गए हैं, जबकि ईसाई परिवारों को बहिष्कृत किया जा रहा है. कई मामलों में परिवारों पर दबाव डाला जा रहा है कि वे ईसाई दफन प्रथा छोड़कर बहुसंख्यक रीति-रिवाज अपनाएं.
एक मामले का जिक्र करते हुए याचिका में बताया गया कि बस्तर जिले के बेनुर गांव में 20 साल पहले दफनाए गए एक ईसाई व्यक्ति के कंकाल को निकालकर जलाया गया और राख बिखेर दी गई, ताकि ईसाई समुदाय को डराया-धमकाया जा सके.
याचिकाकर्ताओं ने दावा किया है कि स्थानीय पुलिस और प्रशासन अक्सर परिवारों की मदद नहीं करते, बल्कि समझौता करने के लिए दबाव बनाते हैं. कई पादरियों को गांव में दफनाने में मदद करने पर गिरफ्तार भी किया गया.
याचिका में मांग की गई है कि राज्य सरकार और निजी व्यक्तियों को गांव में दफनाने में हस्तक्षेप से रोका जाए, सभी व्यक्तियों (धर्म-जाति-आदिवासी स्थिति से परे) को अपने गांव में दफनाने का अधिकार सुनिश्चित किया जाए, ग्राम पंचायतों को सभी समुदायों के लिए कब्रिस्तान चिह्नित करने के निर्देश दिए जाएं और सामाजिक समरसता के लिए साझा कब्रिस्तान को बढ़ावा दिया जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 4 हफ्ते बाद तय की है.