SC का फैसला: नियम बनाने वाली अथॉरिटी को उसमें संशोधन का भी पूरा अधिकार
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सहकारी समिति अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जिस प्राधिकारी (ऑथोरिटी) के पास नियम बनाने का अधिकार है, उसके पास ही उसमें संशोधन, बदलाव या उसे हटाने का भी पूरा अधिकार होता है.
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ सहकारी समिति अधिनियम, 1960 की धारा 55 के तहत रजिस्ट्रार के पास कर्मचारियों की सेवा शर्तों को विनियमित करने और नियम बनाने के साथ-साथ उनमें संशोधन करने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है.
यह पूरा विवाद जिला मध्यवर्ती सहकारी बैंक लिमिटेड, रायपुर के कर्मचारियों की पदोन्नति से जुड़ा था. मामले के अनुसार, तकनीकी पद (सहायक इंजीनियर) पर नियुक्त एस. पी. चंद्राकर की पदोन्नति अतिरिक्त प्रबंधक के प्रशासनिक पद पर की गई थी, जिसे मूल याचिकाकर्ता किशोर बाग (पांचवें प्रतिवादी) द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और बाद में डिवीजन बेंच ने चंद्राकर की पदोन्नति को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि नियमों में किया गया संशोधन वैध नहीं था. हालांकि, 13 साल बाद हुए इस फैसले के खिलाफ अपीलकर्ता (चंद्राकर) ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया.
मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया और माना कि रजिस्ट्रार द्वारा जारी सर्कुलर पूरी तरह से कानून के दायरे में था. अदालत ने यह भी कहा कि सामान्य खंड अधिनियम (General Clauses Act), 1897 की धारा 21 स्पष्ट करती है कि नियम बनाने की शक्ति में संशोधन की शक्ति भी शामिल है.
इसके अलावा, लंबे समय पहले मिली पदोन्नति को इतने सालों बाद रद्द करना भी उचित नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए चंद्राकर की पदोन्नति और वरिष्ठता को बहाल करने का आदेश दिया, साथ ही उन्हें 50 प्रतिशत पिछला वेतन (बैक वेज) देने का भी निर्देश जारी किया.