सुप्रीम कोर्ट ने नारकोटिक्स मामले में नाबालिग को दी जमानत
नई दिल्ली । डेस्क: सुप्रीम कोर्ट ने मादक पदार्थों से जुड़े एक मामले में आरोपी एक नाबालिग को जमानत दे दी है. शीर्ष अदालत ने इस दौरान कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि किशोर न्याय बोर्ड (जेजे बोर्ड) और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट दोनों ही नाबालिग को राहत देने से इनकार करने से पहले किशोर न्याय (जेजे) अधिनियम के तहत आवश्यक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करने में पूरी तरह विफल रहे.
जस्टिस के. वी. विश्वनाथन और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 12 मार्च 2026 के उस आदेश को चुनौती देने वाली एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई कर रही थी, जिसने किशोर की जमानत याचिका खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा था.
इस मामले पर 21 मई को सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हम जमानत देने से इनकार करने के लिए दिए गए कारणों से संतुष्ट नहीं हैं. किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 12 के प्रावधानों के तहत जमानत रोकने के लिए जिन मानकों की आवश्यकता होती है, उनका कोई वस्तुनिष्ठ या निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं किया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता कानून के उल्लंघन में शामिल एक 'किशोर' है और वह इस मामले के मुख्य आरोपियों में से एक के घर में काम करने वाली घरेलू सहायिका का बेटा है, जो वर्तमान में एक ऑब्जर्वेशन होम (सुधार गृह) में बंद है.
जेजे बोर्ड के आदेश की समीक्षा के बाद शीर्ष अदालत ने पाया कि धारा 12 के तहत वैधानिक आवश्यकताओं को सही ढंग से संबोधित नहीं किया गया था. यह कानून उन परिस्थितियों को निर्धारित करता है जिनमें किसी बच्चे को जमानत देने से इनकार किया जा सकता है, जैसे कि यदि उसकी रिहाई से वह किसी नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरे में पड़ सकता हो, या जिससे न्याय के उद्देश्य ही विफल हो जाएं. लेकिन निचली अदालत और हाईकोर्ट ने इस पर कोई ठोस विश्लेषण नहीं किया.
इसके साथ ही अदालत ने एनडीपीएस (NDPS) अधिनियम की धारा 37 के कड़े नियमों पर भी विचार किया, जो नशीले पदार्थों के मामलों में जमानत के लिए बेहद सख्त शर्तें लागू करती है.
पीठ ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 के मापदंडों को लागू करने के बाद भी हम संतुष्ट हैं कि इस मामले में जमानत देने के लिए एक प्रथम दृष्टया मामला बनता है. अदालत ने याचिकाकर्ता की पृष्ठभूमि और उसकी मां की दयनीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपना निष्कर्ष निकाला.
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील विकल्प शर्मा ने दलील दी कि नाबालिग का कोई स्वतंत्र आपराधिक इतिहास या पृष्ठभूमि नहीं है. वह केवल एक आरोपी के घर काम करने वाली महिला का बेटा है, जिसे बिना किसी कानूनी मूल्यांकन के राहत से वंचित कर दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को किशोर न्याय बोर्ड की संतुष्टि के आधार पर शर्तों के साथ जमानत पर तुरंत रिह किया जाए. इसके साथ ही इस विशेष अनुमति याचिका और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया गया.