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सुपर अल नीनो से साढ़े चार लाख से अधिक मौतों की आशंका, भारत चौथे स्थान पर

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24 सित. 2026, 07:27 AM 3 मिनट में पढ़ें 3

Supar El Nino
Supar El Nino

नई दिल्ली । डेस्क: आने वाले छह महीनों में 'सुपर अल नीनो' के प्रकोप से दुनिया भर में भारी तबाही मच सकती है. शिकागो स्थित प्रतिष्ठित अनुसंधान संस्थान ‘क्लाइमेट इंपैक्ट लैब’ द्वारा जारी एक नई रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस भीषण प्राकृतिक घटना के प्रभाव से विश्व भर में 4.5 लाख से भी अधिक लोगों की अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं. अत्यधिक गर्मी, भीषण लू, सूखा, जंगलों की आग और बाढ़ जैसे घातक परिणामों के कारण भारत इस संभावित मृत्यु सूची में चौथे स्थान पर आ सकता है, जहाँ लगभग 15,670 लोगों की जान जाने का खतरा जताया गया है.


ब्रिटिश समाचार पत्र 'द गार्जियन' द्वारा उद्धृत इस रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर से शुरू होकर वर्ष 2027 के मध्य तक तापमान से जुड़ी मौतों की दर काफी उच्च बनी रह सकती है. वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों ने इस विनाशकारी प्रभाव को ‘गॉडज़िला इफेक्ट’ का नाम दिया है. संभावित मृत्यु सूची में पश्चिम अफ्रीकी देश नाइजीरिया सबसे ऊपर है, जहाँ 31,320 मौतों का अनुमान है, जबकि इंडोनेशिया और सूडान क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं.

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वैश्विक तापमान में रिकॉर्ड बढ़ोतरी और ऐतिहासिक तबाही की आहट


क्लाइमेट इंपैक्ट लैब के शोधकर्ता और शिकागो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर माइकल ग्रीनस्टोन का कहना है कि प्रशांत महासागर के पानी का तापमान असाधारण रूप से बढ़ रहा है, जो अतीत के सभी रिकॉर्ड तोड़ सकता है. इसके चलते वर्ष 2027 के मध्य तक वैश्विक स्तर पर स्थल का औसत तापमान सामान्य से लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने की संभावना है. वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव निर्मित वैश्विक तापमान (ग्लोबल वॉर्मिंग) के कारण इस बार अल नीनो और भी अधिक विनाशकारी रूप ले रहा है.


इतिहास इस बात का गवाह है कि वर्ष 1877 में भी दुनिया ने ऐसी ही भयानक प्राकृतिक आपदा का सामना किया था, जब सुपर अल नीनो के कारण भीषण सूखा, फसल की तबाही और अकाल से लाखों लोगों की जान चली गई थी. शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इस बार भी कृषि को भारी नुकसान पहुँचेगा और लगभग 5 करोड़ लोग भुखमरी के संकट में फँस सकते हैं. हालांकि, विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह संख्या कोई अंतिम मृत्यु आंकड़ा नहीं बल्कि एक पूर्व चेतावनी है; यदि समय रहते कूलिंग सेंटर स्थापित किए जाएं, श्रमिकों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए और चिकित्सा सेवाओं में सुधार किया जाए, तो लाखों जानें बचाई जा सकती हैं.


क्या है अल नीनो और ला नीना का चक्र?


अल नीनो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करने वाली सबसे शक्तिशाली प्रक्रियाओं में से एक है. सामान्य परिस्थितियों में भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पूर्वी हिस्से का पानी ठंडा और पश्चिमी हिस्से का पानी गर्म रहता है. लेकिन अल नीनो के दौरान सामान्य व्यापारिक हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, जिससे पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर के समुद्र तट का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है. यह स्थिति आमतौर पर हर 2 से 7 साल में उत्पन्न होती है और 9 से 12 महीनों तक बनी रहती है. जब अल नीनो का यह प्रभाव अत्यंत तीव्र और व्यापक रूप ले लेता है, तो इसे 'सुपर अल नीनो' कहा जाता है, जिससे दुनिया भर में बारिश, सूखे और मौसम का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है.


इसके ठीक विपरीत 'ला नीना' (La Niña) की स्थिति होती है. ला नीना के दौरान प्रशांत महासागर में व्यापारिक हवाएं अत्यधिक मजबूत हो जाती हैं, जिससे पूर्वी प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से बहुत अधिक ठंडा हो जाता है. ला नीना के प्रभाव से दुनिया भर के मौसम पर अल नीनो का उल्टा असर पड़ता है-यह आमतौर पर वैश्विक तापमान को कम करने में मदद करता है और इसके कारण भारतीय उपमहाद्वीप में सामान्य से अधिक मानसूनी बारिश और ठंड देखने को मिलती है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP