सोनम वांगचुक मामला: SC में अगली सुनवाई 14 अक्टूबर को
नई दिल्ली । डेस्क: जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को निवारक हिरासत (preventive detention) में रखे जाने के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 अक्टूबर, 2025) को केंद्र सरकार से मौखिक रूप से विचार करने को कहा कि वह उनकी हिरासत के आधार उनकी पत्नी, डॉ. गीतांजलि आंगमो, के साथ साझा करे. वहीं, केंद्र ने वांगचुक की पत्नी की बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका को केवल "भावनात्मक माहौल" बनाने का एक प्रयास बताया.
जस्टिस अरविंद कुमार और एन.वी. अंजारीया की खंडपीठ ने केंद्र और लद्दाख प्रशासन को नोटिस जारी किया और कहा कि "फिलहाल कुछ किया गया है". कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 अक्टूबर की तारीख तय की है.
वांगचुक को 24 सितंबर को लेह में हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के तहत हिरासत में लिया गया था.
उनकी पत्नी आंगमो ने 26 सितंबर को जोधपुर, राजस्थान में उनकी हिरासत के 10 दिन बाद भी, हिरासत के आधार या उनके स्वास्थ्य के बारे में कोई जानकारी न मिलने का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट से उन्हें अदालत में पेश करने का निर्देश देने की गुहार लगाई थी.
कोर्ट ने हिरासत के आधार पत्नी को बताने या न बताने का निर्णय पूरी तरह से केंद्र और संबंधित अधिकारियों पर छोड़ दिया.
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल का ध्यान NSA की धारा 8 की ओर दिलाया, जिसके अनुसार हिरासत के आधार केवल बंदी को ही बताए जाने आवश्यक हैं.
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अधिकारियों ने तुरंत वांगचुक को आधार बता दिए थे, और NSA के तहत उनकी पत्नी को बताने का कोई अतिरिक्त दायित्व नहीं है.
वांगचुक की पत्नी की ओर से एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने कोर्ट से उन्हें अपने पति से मिलने की अनुमति देने का आग्रह किया और उनके चिकित्सा आवश्यकताओं पर भी चिंता जताई.
कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे वांगचुक को जेल नियमों के तहत अनुमेय सभी चिकित्सा आवश्यकताएं प्रदान करें. बेंच ने गीतांजलि आंगमो को मुलाकात की अनुमति के लिए अधिकारियों से संपर्क करने को कहा, और आश्वासन दिया कि "अगर अनुमति नहीं मिलती है तो आप हमारे पास आ सकती हैं."
गीतांजलि आंगमो ने अपनी याचिका में तर्क दिया है कि हिरासत दुर्भावनापूर्ण (malafide) है और इसका उद्देश्य लोकतांत्रिक असहमति को दबाना है.
याचिका में कहा गया है कि यह कार्रवाई लद्दाख, उसकी पारिस्थितिकी और लोगों की आजीविका की रक्षा के लिए एक शांतिपूर्ण गांधीवादी आंदोलन को बदनाम करने के लिए की गई है.