हसदेव अरण्य में नए खनन प्रस्ताव के विरोध में उतरे सामाजिक संगठन और कांग्रेस
अंबिकापुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ के जैव-विविधता से समृद्ध हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित तारा (संशोधित) कोयला ब्लॉक की नीलामी की घोषणा ने एक बार फिर राजनीतिक और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े विवाद को हवा दे दी है. इस फैसले के खिलाफ स्थानीय जन-संगठनों के साथ-साथ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी मोर्चा खोल दिया है. विरोध कर रहे पक्षों का तर्क है कि खुद राज्य सरकार ने वर्ष 2023 में केंद्र सरकार को औपचारिक पत्र भेजकर तारा सहित कुल नौ कोयला ब्लॉकों को नीलामी प्रक्रिया से बाहर रखने का अनुरोध किया था. इसके बावजूद इस ब्लॉक को नीलामी में शामिल करना प्रशासनिक और राजनीतिक विरोधाभास को स्पष्ट रूप से दर्शाता है.
विधानसभा के सर्वसम्मति प्रस्ताव और सरकारी पत्रों का हवाला
छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और हसदेव अरण्य बचाओ संघर्ष समिति ने इस नीलामी को तुरंत रद्द करने की मांग उठाई है. संगठनों का कहना है कि नए कोयला ब्लॉक को खोलना छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा 26 जुलाई 2022 को सर्वसम्मति से पारित उस संकल्प के पूरी तरह खिलाफ है, जिसमें हसदेव क्षेत्र के आवंटित कोयला ब्लॉकों को रद्द करने की मांग की गई थी.
इसके अतिरिक्त, 23 जून 2023 को राज्य के खनिज संसाधन विभाग द्वारा केंद्रीय कोयला मंत्रालय को भेजे गए एक पत्र में स्पष्ट रूप से नौ कोयला ब्लॉकों को नीलामी सूची से हटाने का आग्रह किया गया था. इस पत्र में तारा के अलावा केरेकोमा, कोंडर, तेंडुआ-मुड़ी, झिलगा-बारपाली, बारपाली-करमी टिकरा, बटाटी कोलगा नॉर्थ ईस्ट, बटाटी कोलगा ईस्ट और फतेहपुर साउथ जैसे ब्लॉक शामिल थे.
कांग्रेस ने केंद्र और राज्य के रुख पर उठाए गंभीर सवाल
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने इस नीलामी प्रक्रिया पर कड़े सवाल खड़े करते हुए कहा कि यह निर्णय समझ से परे है. उन्होंने ध्यान दिलाया कि राज्य सरकार पूर्व में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल अपने हलफनामे में भी यह मान चुकी थी कि हसदेव अरण्य में नए खनन क्षेत्रों को विकसित करने की आवश्यकता नहीं है.
जयराम रमेश के अनुसार, इससे पहले भी अक्टूबर 2023 में केंद्रीय कोयला मंत्रालय ने तारा ब्लॉक को नीलामी प्रक्रिया से वापस ले लिया था. उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य के अपने पूर्व रुख और वैज्ञानिक सिफारिशों को दरकिनार कर इस संवेदनशील जंगल को कोयला खनन के लिए सौंपने की तैयारी की जा रही है.
पर्यावरण और वन्यजीव संतुलन पर गहराते खतरे की चेतावनी
पर्यावरण संगठनों ने भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) द्वारा किए गए जैव-विविधता मूल्यांकन का हवाला देते हुए सचेत किया है कि हसदेव के जंगलों में और अधिक खनन से यह प्राकृतिक भू-भाग छिन्न-भिन्न हो जाएगा. अध्ययन में सिफारिश की गई थी कि वर्तमान में चालू खदानों के अलावा शेष पूरे क्षेत्र को खनन-मुक्त घोषित किया जाए.
यदि इस क्षेत्र में नया खनन शुरू होता है, तो हाथियों का प्राकृतिक आवास खंडित होगा, जिससे लेमरू हाथी रिजर्व और आसपास के इलाकों में मानव-हाथी संघर्ष अभूतपूर्व रूप से बढ़ सकता है. इसे अपनी समृद्ध जैव विविधता और हरियाली के कारण "छत्तीसगढ़ का फेफड़ा" (Lungs of Chhattisgarh) कहा जाता है.
ग्राम सभाओं और जन-आंदोलनों का लंबा संघर्ष जारी
हसदेव अरण्य को बचाने के लिए स्थानीय आदिवासी और वन-आश्रित समुदाय पिछले करीब 15 वर्षों से लगातार संघर्षरत हैं. इस दौरान क्षेत्र की विभिन्न ग्राम सभाओं ने खनन के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए हैं, धरने दिए हैं और पैदल यात्राएं निकाली हैं. वर्ष 2021 में स्थानीय ग्रामीणों ने अपनी मांगों को लेकर मदनपुर से रायपुर तक लगभग 300 किलोमीटर की ऐतिहासिक पैदल मार्च भी किया था.
आंदोलनकारी संगठनों ने स्पष्ट किया है कि विरोध केवल सामाजिक कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक संस्थाओं और वैज्ञानिक अध्ययनों की मुहर के साथ जुड़ा हुआ है. संगठनों ने केंद्र और राज्य सरकार से तारा (संशोधित) ब्लॉक की नीलामी रद्द करने, विधानसभा संकल्प का पालन करने और आदिवासियों के अधिकारों का सम्मान करने की मांग दोहराई है.