पाकिस्तान समर्थक चीन पर चुप्पी और तुर्की का बहिष्कार
छत्तीसगढ़ चीन के मामले में चुप्पी और तुर्की का बहिष्कार
रायपुर | ममता मानकरः पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 'ऑपरेशन सिंदूर' में पाकिस्तान को जो जवाब दिया है, उसकी गूंज आने वाले कई सालों तक पाकिस्तान को सुनाई पड़ेगी. इस ज़ोरदार हमले के जवाब में 7 मई को पाकिस्तान की संसद में उनके विदेश मंत्री इसहाक़ डार ने कहा कि उसने भारत के रफ़ाल को गिराने के लिए J-10C फाइटर जेट इस्तेमाल किया.
भारत ने इससे जुड़े सवाल को टाल दिया. पाकिस्तान जिस J-10C की बात कर रहा है, वो जेट उसे आखिर मिला कहाँ से? जवाब है चीन से.
पाकिस्तान के साथ खड़े होने के कारण देश भर में तुर्की के सेब का बहिष्कार जारी है. आज से लगभग 5 महीने बाद दिवाली होगी. उस समय 'चीनी झालरों का बहिष्कार' ज़ोर-शोर से ट्रेंड करेगा.
ठीक उसी तरह जैसे इन दिनों तुर्की के सेबों का बहिष्कार चल रहा है. भारत में तुर्किये का विरोध पहलगाम हमले के बाद भारत पाकिस्तान के बीच शुरु हुए तनाव के बाद से जारी है.
आरोप है कि तुर्की ने भारत के खिलाफ सैन्य लड़ाई में अपने ड्रोंस पाकिस्तान को दिए. इसके साथ ही पाकिस्तान को तुर्की से मिल रहे समर्थन से भी भारत में इसका गुस्सा साफ़ दिखाई पड़ रहा है.
छत्तीसगढ़ में भी फल व्यापारियों ने ऐलान कर दिया है कि अब तुर्की से सेब नहीं मंगाएंगे.
अभी पिछले हफ्ते ही भारत सरकार ने तुर्की के साथ तनाव के बीच सेलेबी एविएशन के लिए सुरक्षा मंजूरी रद्द कर दी है, जिससे नौ हवाई अड्डों पर जमीनी सेवाएं प्रभावित होंगी और व्यवधान उत्पन्न होने की संभावना है.
मगर सच कहें तो यही बहिष्कार चाइना के मामले में कहीं गुम सा गया है क्योंकि व्यापार के आंकड़े कुछ और ही कहानी कह रहे हैं.
कूटनीतिक मंच पर दोनों देश चाहे जितनी तल्ख़ी दिखाएं, सीमा पर चाहे कितनी भी कड़वाहट हो, वाणिज्यिक रिश्तों में चीन और भारत की मिठास बराबर बनी हुई है.
यहां तक कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को सभी तरह के हथियार, हथियार से जुड़ी तकनीक और यहां तक कि सैन्य मदद भी उपलब्ध कराने वाले चीन को लेकर कहीं चर्चा नहीं हो रही है.
चीन के साथ व्यापार घाटा दोगुना बढ़ा
इस चुप्पी को समझना मुश्किल नहीं है. आत्मनिर्भर भारत के नारों के बीच चीन से होने वाले आयात के आंकड़े इसकी कहानी साफ़-साफ़ कहते हैं.
2013 में यानी भाजपा की सरकार से पहले चीन से भारत, 51.6 बिलियन अमरीकी डॉलर के उत्पाद का आयात करता था, जो 2023 में बढ़ कर 122 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया और इसके उलट 2013 में जिस चीन को भारत 16.4 बिलियन डॉलर का निर्यात करता था, 2023 में वह घट कर 16.2 बिलियन डॉलर रह गया. यानी चीन तो 51.6 बिलियन से दुगुना से भी अधिक बढ़ कर 122 बिलियन हो गया और हम इन 10 सालों में वहीं के वहीं रह गये.
हालत ये है कि आज पूरा भारतीय बाजार चीन से पटा पड़ा है. इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हों या बॉयलर, प्लास्टिक हो या चिकित्सा उपकरण या फिर बच्चों के ख़िलौने, चीन ने इन सब के बाज़ार पर कब्ज़ा कर रखा है.
चीन से आयातित उत्पाद और कीमत बिलियन डॉलर में
विद्युत्, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण 44.15 बिलियन, मशीनरी, परमाणु रिएक्टर, बॉयलर 24.70 बिलियन.
जैविक रसायन 13.27 बिलियन, प्लास्टिक 5.93 बिलियन, ऑप्टिकल, फोटो, तकनीकी, चिकित्सा उपकरण 2.63.
भारत से चीन निर्यात किए जाने वाले मुख्य उत्पाद
अयस्क लावा और राख 3.42 बिलियन, मछली, क्रस्टेशियन, मोलस्क, जलीय अकशेरुकी 1.25 बिलियन.
जैविक रसायन 13.27 बिलियन, प्लास्टिक 5.93 बिलियन, ऑप्टिकल, फोटो, तकनीकी, चिकित्सा उपकरण 2.63 बिलियन है.
आयात और निर्यात में 106 बिलियन डॉलर का फर्क
संयुक्त राष्ट्र कॉमट्रेड डेटाबेस के अनुसार 2023 में, चीन को भारत का मुख्य निर्यात 16.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का था. इन निर्यातों में जैविक रसायन, खनिज ईंधन, अयस्क, कपास और तांबा जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल थे.
इसके उलट चीन हमसे 122 बिलियन डॉलर का धंधा कर रहा था. 2023 में चीन से भारत के आयात में विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का वर्चस्व था.
उसके बाद मशीनरी और परमाणु रिएक्टर थे. कार्बनिक रसायन, प्लास्टिक और ऑप्टिकल, फोटो, तकनीकी और चिकित्सा उपकरण भी प्रमुखता से शामिल थे.
100 से अधिक चीनी कंपनियों का भारत में कार्यालय
भारतीय दूतावास के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आज की तारीख में 100 से अधिक चीनी कंपनियों ने भारत में कार्यालय/प्रचालन स्थापित किए हैं.
मशीनरी और बुनियादी ढांचा निर्माण के क्षेत्र में कई बड़ी चीनी सरकारी कंपनियों ने भारत में परियोजनाएं हासिल की हैं और भारत में परियोजना कार्यालय खोले हैं.
इनमें सिनोस्टील, शौगांग इंटरनेशनल, बाओशान आयरन एंड स्टील लिमिटेड, सानी हैवी इंडस्ट्री लिमिटेड, चोंगकिंग लिफान इंडस्ट्री लिमिटेड, चाइना डोंगफैंग इंटरनेशनल, सिनो हाइड्रो कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियां शामिल हैं.
कई चीनी इलेक्ट्रॉनिक, आईटी और हार्डवेयर निर्माण कंपनियां भी भारत में परिचालन कर रही हैं. इनमें हुआवेई टेक्नोलॉजीज, जेडटीई, टीसीएल, हायर आदि शामिल हैं.
बड़ी संख्या में चीनी कंपनियां, भारत की पावर सेक्टर में ईपीसी परियोजनाओं में शामिल हैं. इनमें शंघाई इलेक्ट्रिक, हार्बिन इलेक्ट्रिक, डोंगफैंग इलेक्ट्रिक, शेनयांग इलेक्ट्रिक शामिल हैं.
भारत सरकार अपनी सड़क परियोजनाओं का ठेका भी चीनी कंपनियों को देती है.
तुर्की के साथ भारत फायदे में था
चीन पर हमारी नज़र केवल झालरों तक टिकी हुई है. तुर्की के मामले में देश का रुख कुछ अलग है और चीन के मामले में अलग.
यह देखना भी दिलचस्प है कि हाल के वर्षों में भारत और तुर्की के बीच आर्थिक संबंधों में नई गति आई है. भारत-तुर्की व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो 2022-23 में 13.80 बिलियन डॉलर को पार कर गया था.
वित्त वर्ष 2023-24 में तुर्की के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 10.43 बिलियन डॉलर रहा, जिसमें भारत का तुर्की को निर्यात 6.65 बिलियन डॉलर और आयात 3.78 बिलियन डॉलर था.
तुर्किए का बहिष्कार अपनी जगह है, उसके पक्ष-विपक्ष में तर्क हो सकते हैं. लेकिन पाकिस्तान को असली मदद करने वाले चीन को लेकर हमारी नरमी बताती है कि हमारा विरोध कहीं न कहीं औपचारिक भी है और संभवतः राजनीतिक भी.