शेख हसीना का प्रत्यर्पण, विशेषज्ञों ने कहा- नई दिल्ली बाध्य नहीं
नई दिल्ली/ढाका । डेस्क: बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्रिब्यूनल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मानवताविरोधी अपराध के लिए फांसी की सजा सुनाई है. हिंसा भड़काने, हत्या का आदेश देने और दमन के दौरान पुलिस को निष्क्रिय रखने के तीन प्रमुख आरोपों में उन्हें दोषी ठहराया गया. वर्तमान में भारत में शरण ले रखी हसीना के प्रत्यर्पण पर सवाल उठ रहे हैं. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने कहा है कि वह भारत को फिर से पत्र लिखकर हसीना को सौंपने की मांग करेगी, लेकिन क्या नई दिल्ली ऐसा करेगी, यह अनिश्चित है.
हसीना अगस्त 2024 में छात्र-जनता के आंदोलन के बाद सत्ता से हटकर भारत आ गईं. तब से वे दिल्ली में रह रही हैं. बांग्लादेश की अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, ने दिसंबर 2024 में ही प्रत्यर्पण के लिए कूटनीतिक नोट भेजा था. भारत ने पत्र प्राप्ति की पुष्टि की, लेकिन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अभी कोई टिप्पणी नहीं की जा सकती. मंत्रालय स्रोतों के अनुसार, अंतरिम सरकार के अनुरोध की वैधता जांच की जा रही है, क्योंकि यह जनता द्वारा चुनी हुई नहीं है.
अक्टूबर 2025 में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने स्पष्ट किया कि मामला कानूनी है. उन्होंने कहा, "यह न्यायिक और कानूनी प्रक्रिया है. दोनों देशों के बीच चर्चा और परामर्श जरूरी है. हम बांग्लादेश प्राधिकारियों के साथ मिलकर काम करने को तैयार हैं." भारत-बांग्लादेश के बीच 2013 में हुई प्रत्यर्पण संधि के तहत, अदालती फैसले वाले अपराधों में व्यक्ति को सौंपा जा सकता है. इसमें कम से कम एक साल की जेल या अधिक सजा वाले अपराध शामिल हैं. अपराध दोनों देशों में दंडनीय होना चाहिए. 2016 के संशोधन से प्रक्रिया आसान हुई- गिरफ्तारी वारंट होने पर बिना अतिरिक्त सबूत सौंपा जा सकता है. हसीना के खिलाफ कई मामलों में वारंट जारी हैं.
फिर भी, विशेषज्ञों का कहना है कि भारत बाध्य नहीं. यदुवंश विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अनिंद्यज्योति मजूमदार ने कहा, "संधि में शर्तें हैं जो प्रत्यर्पण रोक सकती हैं." प्रोफेसर ईमानकल्यान लाहिड़ी और रवींद्र भारती विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सब्यसाची बसु रायचौधुरी ने भी सहमति जताई. संधि में स्पष्ट है कि राजनीतिक अपराधों में प्रत्यर्पण नहीं होगा. हत्या, अपहरण और अत्याचार जैसे आरोपों को राजनीतिक माना जा सकता है. सबसे महत्वपूर्ण, अगर प्रत्यर्पण से व्यक्ति की जान को खतरा हो या मुकदमा बदले की भावना से हो, तो सौंपना जरूरी नहीं. हसीना ने खुद आरोप लगाया है कि उनके खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध हो रहा है.
कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील अरिंदम दास ने कानूनी पहलू समझाया, "हसीना सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती हैं. अगर प्रत्यर्पण से उनका मौलिक अधिकार प्रभावित होता है, तो भारत ऐसा नहीं करेगा. अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार कानून के तहत, जान का खतरा होने पर आश्रय देने वाला देश प्रत्यर्पण से बच सकता है." ट्रिब्यूनल के फैसले की प्रति भेजी जाएगी, लेकिन भारत इसे मानने को बाध्य नहीं.
यह संधि 2013 में सीमा पर छिपे अपराधियों को पकड़ने के लिए हुई थी. उस समय पूर्वोत्तर भारत में उग्रवादियों के बांग्लादेश में छिपने की खबरें थीं.
जमात-उल-मुजाहिदीन जैसे संगठनों की घुसपैठ रोकने का मकसद था. हसीना के मामले ने दोनों देशों के रिश्तों में नई चुनौती पैदा कर दी है. अंतरिम सरकार के कानूनी सलाहकार आसिफ नजरुल ने कहा कि वे दोबारा पत्र भेजेंगे, लेकिन भारत की प्रतिक्रिया का इंतजार है. क्या यह कूटनीतिक तनाव बढ़ाएगा, यह देखना बाकी है.