गुप्त कॉल रिकॉर्डिंग को निजता के आधार पर नहीं कर सकते खारिज- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजता का संवैधानिक अधिकार (Right to Privacy) किसी भी गुप्त कॉल रिकॉर्डिंग को अदालती कार्यवाही में सबूत के तौर पर पेश करने से पूरी तरह नहीं रोकता है. अदालत ने कहा कि केवल इसलिए कि कोई बातचीत दूसरी पार्टी की जानकारी या सहमति के बिना रिकॉर्ड की गई थी, उसे सीधे तौर पर खारिज नहीं किया जा सकता.
ऐसी रिकॉर्डिंग को अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार करने से पहले उसकी प्रासंगिकता, प्रामाणिकता और कानूनी नियमों के अनुपालन की कसौटी पर परखा जाना जरूरी है.
जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने मानित सिंह वाधवा नामक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया. याचिकाकर्ता ने रायगढ़ में एक भूमि बिक्री समझौते से जुड़े दीवानी मामले में अपने भाई और प्रतिवादी के बीच फोन पर हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग, उसका ट्रांसक्रिप्ट और फोरेंसिक विश्लेषण रिपोर्ट अदालत के रिकॉर्ड पर रखने की अनुमति मांगी थी.
इससे पहले, निचली अदालत ने 27 मार्च को याचिकाकर्ता के इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि बिना अनुमति के बातचीत रिकॉर्ड करना प्रतिवादी के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त निजता के अधिकार का उल्लंघन है.
उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के इस फैसले को क्षेत्राधिकार की गंभीर भूल बताते हुए रद्द कर दिया. जस्टिस अग्रवाल ने अपने आदेश में कहा कि निजता का अधिकार भले ही एक मौलिक अधिकार है, लेकिन यह कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है जो निजी तौर पर रिकॉर्ड की गई हर बातचीत को न्यायिक प्रक्रिया से बाहर कर दे.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई साक्ष्य वैध है या नहीं, उसकी आवाज असली है या उसके साथ कोई छेड़छाड़ की गई है, ये सभी मामले ट्रायल के दौरान सबूत पेश करने के चरण में तय किए जाने चाहिए, न कि दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने के शुरुआती चरण में ही उन्हें खारिज कर दिया जाए.
इस फैसले को कानूनी आधार देने के लिए हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया. अदालत ने 'आर. एम. मलकानी बनाम महाराष्ट्र राज्य (1973)' और 'पूरनमल बनाम निरीक्षण निदेशक (1974)' मामलों का जिक्र किया, जिनमें शीर्ष अदालत ने माना था कि यदि कोई सबूत मामले से सुसंगत है, तो उसे केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे किस तरह हासिल किया गया था, जब तक कि कानून में ऐसा कोई स्पष्ट प्रतिबंध न हो. इसके अलावा, निजता के अधिकार से जुड़े ऐतिहासिक 'के. एस. पुट्टास्वामी (2017)' फैसले का भी जिक्र किया गया, जिसमें कहा गया था कि निजता का अधिकार पूर्ण नहीं है और इस पर उचित कानूनी प्रतिबंध लागू होते हैं.
हाई कोर्ट ने अंततः रिट याचिका को स्वीकार करते हुए रायगढ़ की निचली अदालत के आदेश को दरकिनार कर दिया और निर्देश दिया कि ऑडियो रिकॉर्डिंग, ट्रांसक्रिप्ट और संबंधित दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लिया जाए.
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसने अभी इस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता या उसकी स्वीकार्यता पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है. निचली अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह दोनों पक्षों की आपत्तियों और साक्ष्यों पर विचार करने के बाद स्वतंत्र रूप से और कानून के दायरे में रहकर इस पर अंतिम फैसला करे.