शनि, 17 अक्टू. 2026

CGKhabar

SC वैवाहिक दुष्कर्म मामले में केंद्र के जवाब का करेगा इंतजार

C

CG Khabar

07 सित. 2026, 08:24 AM 3 मिनट में पढ़ें 2

सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । डेस्क: देश में वैवाहिक दुष्कर्म (मैरिटल रेप) को अपराध की श्रेणी में लाने से जुड़ी याचिकाओं के बैच पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि वह सुनवाई की अगली तारीख तय करने से पहले इस मुद्दे पर केंद्र सरकार के रुख का इंतजार करेगा. प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने इस मामले को जल्दी सूचीबद्ध करने की मांग की थी.


नवंबर में तय तारीख की मांग और केंद्र का जवाब


याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत से निवेदन किया कि इस मामले को नवंबर में किसी निश्चित तारीख पर सुनवाई के लिए रखा जाए. उन्होंने पीठ को बताया कि हालांकि मामला बुधवार (9 सितंबर) को सूचीबद्ध है, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक केवल प्रारंभिक आपत्ति ही दर्ज कराई है और कोई विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया है.

विज्ञापन


इसके अलावा, पक्षों के बीच याचिकाओं का आदान-प्रदान भी नहीं हुआ है, जिससे मामले की समानताओं या मतभेदों को स्पष्ट किया जा सके. इस पर पीठ ने स्पष्ट किया कि बुधवार को केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद ही आगे की उपयुक्त तारीख तय की जाएगी. वहीं, अन्य याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने भी कागजी प्रक्रिया और दलीलों को पूरा करने के लिए एक निश्चित तारीख तय करने का अनुरोध किया.


कानूनी प्रावधान और संवैधानिक वैधता


यह मामला भारतीय कानून में वैवाहिक दुष्कर्म को मिलने वाली कानूनी छूट की संवैधानिक वैधता से जुड़ा हुआ है. पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 375 के अपवाद के तहत, यदि पत्नी बालिग (18 वर्ष या उससे अधिक) है, तो पति द्वारा उसके साथ संबंध बनाना दुष्कर्म के दायरे में नहीं आता था. देश में लागू नए कानून 'भारतीय न्याय संहिता' (बीएनएस) में भी इस छूट को बरकरार रखा गया है.


बीएनएस की धारा 63 के अपवाद 2 के अनुसार, 18 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति द्वारा बनाया गया शारीरिक संबंध दुष्कर्म नहीं माना गया है. याचिकाओं में इन प्रावधानों को महिलाओं के खिलाफ भेदभावपूर्ण और संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई है.


अदालतों के फैसले और मामले की पृष्ठभूमि


सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर जनवरी 2023 में केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था, जिसके बाद नए कानूनों (बीएनएस) में शामिल इस प्रावधान के खिलाफ दाखिल याचिकाओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया. यह मुद्दा दिल्ली उच्च न्यायालय के मई 2022 के उस विभाजित फैसले से भी जुड़ा है, जिसमें दो जजों की पीठ एकराय नहीं हो सकी थी. 


न्यायमूर्ति राजीव शकधर ने इस प्रावधान को असंवैधानिक मानते हुए रद्द करने का समर्थन किया था, जबकि न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर ने इसे संवैधानिक माना था. हालांकि, दोनों न्यायाधीशों ने मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की अनुमति दी थी. इससे पहले कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी माना था कि पति को इस तरह की छूट देना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है.

यह खबर शेयर करें: WhatsApp Facebook
CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP