रूस में कैंसर वैक्सीन का ट्रायल शुरू, भारत में कीमत पर सस्पेंस
नई दिल्ली । डेस्क: रूस ने कैंसर के खिलाफ जंग में एक नया इतिहास रचने की दिशा में कदम बढ़ाया है. मॉस्को के मशहूर गामालेया रिसर्च सेंटर और फेडरल मेडिकल एंड बायोलॉजिकल एजेंसी (एफएमबीए) ने दो क्रांतिकारी कैंसर वैक्सीन को मानव ट्रायल के लिए अंतिम मंजूरी हासिल कर ली है. इन वैक्सीन्स के ट्रायल इस साल के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है, जिसने वैश्विक चिकित्सा जगत में उम्मीद की किरण जगा दी है.
गामालेया रिसर्च सेंटर, जिसने कोविड महामारी के दौरान तेजी से वैक्सीन बनाकर सुर्खियां बटोरी थीं, ने अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से एक पर्सनलाइज्ड मेसेंजर आरएनए (mRNA) वैक्सीन तैयार की है.
वैज्ञानिकों का दावा है कि यह वैक्सीन हर मरीज के लिए खास तौर पर बनाई जाएगी. यह मरीज के ट्यूमर की जेनेटिक संरचना का विश्लेषण कर, एआई की मदद से ऐसा डिजाइन तैयार करती है, जो रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर नष्ट करने के लिए प्रशिक्षित करता है.
शुरूआत में यह वैक्सीन मेलानोमा (त्वचा कैंसर) के मरीजों पर आजमाई जाएगी, लेकिन बाद में फेफड़े, अग्न्याशय और मस्तिष्क के कैंसर के लिए भी इसकी प्रभावशीलता परखी जाएगी.
दूसरी ओर, एफएमबीए ने ‘एंटेरोमिक्स’ नाम की एक और mRNA वैक्सीन विकसित की है, जो मुख्य रूप से कोलोरेक्टल (मलाशय) कैंसर को निशाना बनाएगी. एफएमबीए की प्रमुख वेरोनिका स्कवॉर्त्सोवा ने बताया कि प्री-क्लिनिकल परीक्षणों में यह वैक्सीन न केवल ट्यूमर की वृद्धि को रोकने में सफल रही, बल्कि इसे 60 से 80 प्रतिशत तक सिकोड़ने में भी कारगर साबित हुई.
उन्होंने कहा, “यह वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित और अत्यधिक प्रभावी है. हम मानव ट्रायल के लिए तैयार हैं.”
विशेषज्ञों का मानना है कि इन वैक्सीन्स की सबसे बड़ी खासियत इनका लक्षित उपचार है. ये कीमोथेरेपी या रेडिएशन की तरह स्वस्थ और कैंसर कोशिकाओं पर एकसाथ हमला नहीं करतीं, बल्कि केवल कैंसर कोशिकाओं को निशाना बनाती हैं. इससे दुष्प्रभाव काफी कम होने की उम्मीद है.
रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय ने घोषणा की है कि अगर ट्रायल सफल रहे, तो यह वैक्सीन रूस के नागरिकों के लिए मुफ्त उपलब्ध होगी.
हालांकि, इसके उत्पादन की लागत काफी अधिक है. रूस के बाहर, खासकर भारत में इसकी कीमत क्या होगी, इस बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है.
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ये ट्रायल सफल रहे, तो कैंसर के इलाज में क्रांति आ सकती है. लेकिन इसके लिए लंबे और जटिल परीक्षणों को सफलतापूर्वक पार करना अभी सबसे बड़ी चुनौती है.
(फोटो- प्रतीकात्मक)