प्राइवेट उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण, केंद्र ने कहा राज्यों की जिम्मेदारी
नई दिल्ली । डेस्क: केंद्र सरकार ने निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए आरक्षण लागू करने के मामले में एक तटस्थ रुख अपनाया है. राज्यसभा में समाजवादी पार्टी के सांसद जावेद अली खान द्वारा पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने स्पष्ट किया कि निजी और गैर-सहायता प्राप्त संस्थानों में आरक्षण लागू करना पूरी तरह से राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है.
शिक्षा राज्य मंत्री ने संवैधानिक प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है और निजी विश्वविद्यालय राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित अधिनियमों के तहत स्थापित होते हैं. इसलिए, इन संस्थानों में आरक्षण के लिए विधायी प्रावधान करना राज्यों का काम है.
सरकार ने उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार जैसे राज्यों का जिक्र किया जिन्होंने अपने यहां निजी विश्वविद्यालयों के लिए आरक्षण कानून बनाए हैं. हालांकि, संविधान के अनुच्छेद 15(5) और 15(6) में निजी संस्थानों में आरक्षण का प्रावधान एक 'सक्षम प्रावधान' के रूप में मौजूद है, जिसे लागू करने के लिए अलग से कानून बनाना अनिवार्य है.
इस रुख की आलोचना करते हुए ऑल इंडिया ओबीसी एम्प्लॉइज फेडरेशन ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार कॉर्पोरेट हितों को बचाने के लिए जिम्मेदारी से पीछे हट रही है.
जानकारों का कहना है कि जहां केंद्र ने 2019 में ईडब्ल्यूएस कोटा के लिए संवैधानिक संशोधन तो किया, लेकिन निजी क्षेत्र में इसे अनिवार्य बनाने के लिए केंद्रीय कानून लाने से परहेज कर रही है. वर्तमान में यह मामला राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है क्योंकि संसद की शिक्षा संबंधी स्थायी समिति ने भी निजी संस्थानों में आरक्षण लागू करने का समर्थन किया है.