छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों से सिमटा लाल आतंक
नई दिल्ली । डेस्क: भारत में छह दशकों से चले आ रहे वामपंथी उग्रवाद (LWE) और माओवादी हिंसा के खिलाफ देश को एक बड़ी ऐतिहासिक सफलता हासिल हुई है. साल 2026 में देश के भीतर माओवादी हिंसा अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 21 जुलाई 2026 तक देश भर में केवल 33 नक्सली घटनाएं दर्ज की गई हैं, जो इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि एक समय देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती माना जाने वाला लाल आतंक अब अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है.
तुलनात्मक रूप से देखें तो देश में 2021 में 361, 2022 में 413, 2023 में 486, 2024 में 375 और 2025 में 234 नक्सली घटनाएं दर्ज की गई थीं.
देशभर में हिंसा के ग्राफ में आई इस भारी गिरावट के बीच छत्तीसगढ़, जिसे लंबे समय तक नक्सलियों का सबसे मजबूत गढ़ माना जाता था, वहां भी स्थिति में अभूतपूर्व सुधार देखा गया है.
गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में जहां 2023 में 305 और 2024 में 268 घटनाएं हुई थीं, वहीं 2025 में यह घटकर 144 रह गईं और साल 2026 में 21 जुलाई तक केवल 18 घटनाएं दर्ज की गई हैं.
राज्य में आम नागरिकों की मौतों के आंकड़ों में भी भारी कमी आई है; जहां 2024 में रिकॉर्ड 106 नागरिकों की जान गई थी, वहीं 2026 में यह संख्या सिमटकर मात्र तीन रह गई है. इसके अलावा, सुरक्षा बलों के जवानों की शहादत का आंकड़ा भी 2021 के 45 से घटकर इस साल केवल चार रह गया है.
सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, बस्तर और आसपास के दुर्गम वन क्षेत्रों में चलाए गए आक्रामक और सघन अभियानों ने माओवादियों के मजबूत ठिकानों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है.
छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों में भी माओवादी नेटवर्क पूरी तरह से बिखर चुका है. झारखंड में 2023 की 129 घटनाओं की तुलना में 2026 में अब तक केवल 13 मामले सामने आए हैं और इस साल सुरक्षा बलों का एक भी जवान शहीद नहीं हुआ है. बिहार और आंध्र प्रदेश लगभग पूरी तरह से नक्सल मुक्त हो चुके हैं, जहां 2026 में एक भी घटना दर्ज नहीं की गई है.
महाराष्ट्र, ओडिशा और मध्य प्रदेश में भी नक्सलियों का दायरा बेहद सीमित हो चुका है, जबकि पश्चिम बंगाल में पिछले छह वर्षों से कोई हिंसा नहीं हुई है. पूरे देश में आम नागरिकों की मौतों की संख्या 2023 के 107 से घटकर 2026 में केवल छह रह गई है, जबकि सुरक्षा बलों की शहादत का आंकड़ा भी 50 से गिरकर मात्र पांच पर आ गया है.
सुरक्षा बलों को मिली इस बड़ी कामयाबी के पीछे सीपीआई (माओवादी) के शीर्ष सैन्य रणनीतिकार और वरिष्ठ नेता मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी को भी एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है. केंद्र सरकार इस सफलता का श्रेय अपनी 'राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' को देती है, जिसके तहत आक्रामक सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास किया गया.
दुर्गम इलाकों में सड़कों का निर्माण, मोबाइल कनेक्टिविटी, स्कूल, स्वास्थ्य सुविधाएं और वित्तीय समावेशन जैसे कदमों ने नक्सलियों के आधार को कमजोर किया है.
गृह मंत्रालय के अनुसार, अब देश का एक भी जिला आधिकारिक तौर पर नक्सल प्रभावित श्रेणी में नहीं है, जबकि पहले ऐसे जिलों की संख्या 126 थी. हालांकि, सुरक्षा और विकास की निरंतरता बनाए रखने के लिए 37 जिलों को 'विरासत और जोर' (Legacy and Thrust) श्रेणी में रखा गया है.
प्रख्यात सुरक्षा विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बी.के. खन्ना के अनुसार, हिंसा के आंकड़ों में आई यह भारी गिरावट और शीर्ष नेतृत्व का सफाया इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भारत अब अपने सबसे लंबे आंतरिक सुरक्षा संघर्ष के अंतिम चरण का गवाह बन रहा है.