सिर्फ गर्भपात से दुष्कर्म का अपराध सिद्ध नहीं- हाईकोर्ट
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक मामले की सुनवाई के दौरान बेहद महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी की है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल यह साबित कर देना ही किसी पुरुष को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है कि महिला गर्भवती हुई थी और बाद में उसका गर्भपात हो गया. अदालत के अनुसार, अभियोजन पक्ष को यह भी सिद्ध करना होगा कि गर्भपात आरोपी के ही किसी कृत्य के कारण हुआ था और इसके लिए महिला की सहमति शामिल नहीं थी.
यह निर्णय न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की एकल पीठ ने मई 2016 के निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनाया, जिसमें आरोपी को तीन साल के सश्रम कारावास और पांच हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी. उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों में कमियां पाते हुए आरोपी को सभी आरोपों से बरी कर दिया.
विवाह का झांसा और गर्भपात के आरोप
मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, पीड़िता ने मई 2013 में पुलिस में प्राथमिकी दर्ज कराई थी. महिला का आरोप था कि पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति ने शादी का झांसा देकर एक साल तक उसका शारीरिक शोषण किया, जिससे वह गर्भवती हो गई. पीड़िता का दावा था कि जब उसने विवाह का दबाव बनाया, तो आरोपी ने उसकी जाति का हवाला देकर इनकार कर दिया और धोखे से कुछ दवाएं खिला दीं, जिससे उसका गर्भपात हो गया. चिकित्सीय जांच में महिला 10 से 12 सप्ताह की गर्भवती पाई गई थी और डॉक्टरों ने माना कि गर्भपात प्राकृतिक या बाहरी कारणों से हो सकता है. इसके बाद पुलिस ने जुलाई 2013 में आरोपी को गिरफ्तार कर लिया था.
अदालत में पेश किए गए मुख्य तर्क
अपील की सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की अधिवक्ता सीमा वर्मा ने तर्क दिया कि पीड़िता विवाहित थी और अपने पति के साथ रह रही थी. उन्होंने अदालत को बताया कि गर्भस्थ शिशु का कोई डीएनए परीक्षण नहीं कराया गया, जिससे यह साबित हो सके कि गर्भधारण आरोपी से ही हुआ था. साथ ही, इस बात का भी कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य मौजूद नहीं है कि आरोपी ने महिला को जबरन दवाएं खिलाई थीं. दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि पीड़िता के बयानों से अपराध पूरी तरह साबित होता है.
सहमति और सबूतों के अभाव में बरी
उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों और जिरह का अवलोकन करते हुए पाया कि महिला ने खुद स्वीकार किया था कि उसका आरोपी के साथ प्रेम प्रसंग था और दोनों के बीच सहमति से संबंध बने थे. अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि पीड़िता ने घटना की जानकारी अपने परिजनों को नहीं दी थी और न ही पुलिस को कोई चिकित्सा पर्ची या दवाइयां सौंपी थीं.
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन को यह बात 'संदेह से परे' साबित करनी होती है कि गर्भपात आरोपी के कृत्य से हुआ और उसमें महिला की इच्छा शामिल नहीं थी. यदि महिला ने खुद दवाएं ली हों या वह स्वेच्छा से अस्पताल गई हो, तो केवल चिकित्सीय रिपोर्ट के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. अदालत ने साक्ष्यों के अभाव और संदेह का लाभ देते हुए आरोपी की सजा रद्द कर दी.