अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर जनता का भरोसा डगमगाया
वाशिंगटन । डेस्क: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं. हाल ही में आए एक नए गैलप पोल (Gallup Poll) के अनुसार, केवल 16 प्रतिशत अमेरिकी नागरिक ही देश की मौजूदा आर्थिक स्थिति को "अच्छी" या "उत्कृष्ट" मानते हैं. ईरान के साथ चल रहे युद्ध और उसके कारण आसमान छूती महंगाई ने अमेरिकी जनता के भीतर भारी असंतोष पैदा कर दिया है.
यह सर्वेक्षण ऐसे समय में सामने आया है जब नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं. ये चुनाव तय करेंगे कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी कांग्रेस पर अपना नियंत्रण बरकरार रख पाएगी या नहीं. वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए रिपब्लिकन खेमे के लिए राह बेहद चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है.
आर्थिक सूचकांक में ऐतिहासिक गिरावट
गैलप के इकोनॉमिक कॉन्फिडेंस इंडेक्स (आर्थिक विश्वास सूचकांक) के नतीजे बेहद चिंताजनक हैं. इस सूचकांक में जनता का भरोसा गिरकर -45 पर पहुंच गया है. सर्वेक्षण में शामिल लगभग 49 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने देश की आर्थिक स्थिति को "खराब" बताया है, जबकि 34 प्रतिशत लोगों ने इसे "औसत" श्रेणी में रखा है.
इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि 76 प्रतिशत अमेरिकियों का मानना है कि देश की अर्थव्यवस्था लगातार बदतर होती जा रही है, जबकि केवल 20 प्रतिशत लोग ही इसे सुधार की दिशा में देख रहे हैं. साल 2022 में कोविड-19 महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पैदा हुए संकट के बाद से अर्थव्यवस्था को लेकर यह अब तक के सबसे खराब आंकड़े हैं.
ईंधन की कीमतों में आग और ऊर्जा संकट
फरवरी के उत्तरार्ध में ईरान के साथ संघर्ष शुरू होने के बाद से अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बेकाबू हो चुकी हैं. युद्ध की शुरुआत से पहले जिस गैलन पेट्रोल की कीमत 3 डॉलर से कम थी, वह अब बढ़कर 4.55 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच चुकी है. सरकारी रिपोर्टों की मानें तो इस ऊर्जा संकट के कारण मार्च और अप्रैल के महीनों में उपभोक्ता कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया गया है.
ईरान ने अमेरिका और इजरायल के हमलों के जवाब में रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' को बंद कर दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो गई है.
जवाब में अमेरिका ने भी ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी कर दी है, जिसने वैश्विक ऊर्जा संकट को और गहरा कर दिया है. अप्रैल में संघर्षविराम लागू होने के बावजूद यह नाकेबंदी जारी है और ईरान अब इस अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर अपनी संप्रभुता का दावा कर रहा है.
वादों से मुकरे राष्ट्रपति और राजनीतिक विरोध
चुनाव प्रचार के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने खुद को "शांति का राष्ट्रपति" बताते हुए 'अमेरिका फर्स्ट' की नीति अपनाने का वादा किया था, जिसमें विदेशी हस्तक्षेप के बजाय घरेलू मुद्दों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी. हालांकि, बिना किसी सीधे उकसावे के इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर हमला करने के उनके फैसले ने सबको चौंका दिया है.
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि तेहरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए यह सैन्य अभियान बेहद जरूरी था.
दूसरी ओर, ईरान इन आरोपों से इनकार करता रहा है और खुद ट्रंप की खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड ने भी माना है कि तेहरान कोई परमाणु बम नहीं बना रहा है. इन सबके बीच अमेरिकी जनता का रुख ट्रंप के खिलाफ होता दिख रहा है; हालिया न्यूयॉर्क टाइम्स/सिएना पोल के मुताबिक, केवल 31 प्रतिशत मतदाता ही ईरान युद्ध को लेकर ट्रंप के फैसलों का समर्थन कर रहे हैं.
वित्तीय स्थिति पर ट्रंप का विवादित बयान
आर्थिक मोर्चे पर चौतरफा घिरे राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने फैसलों का यह कहकर बचाव किया है कि युद्ध की यह कीमत चुकाना जरूरी है और संघर्ष समाप्त होते ही पेट्रोल के दाम तेजी से नीचे आ जाएंगे.
हालांकि, हाल ही में दिए गए उनके एक बयान ने देश के भीतर नया विवाद खड़ा कर दिया है. ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वह ईरान के प्रति अपनी रणनीति तय करते समय अमेरिकी नागरिकों की वित्तीय स्थिति के बारे में नहीं सोचते.
उन्होंने कहा कि उनका एकमात्र मकसद ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है और यही बात उन्हें प्रेरित करती है. राष्ट्रपति के इस रुख और विदेश नीति की प्राथमिकताओं ने घरेलू स्तर पर उनके प्रति जनता के गुस्से को और हवा दे दी है, जिसका सीधा असर आगामी चुनावों में देखने को मिल सकता है.