SECL से आंशिक मदद, डीएवी स्कूल RTI के दायरे में नहीं- HC
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि कोई निजी गैर-अनुदान प्राप्त स्कूल (प्राइवेट अनएडेड स्कूल) केवल इसलिए सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत "लोक प्राधिकारी" (पब्लिक अथॉरिटी) नहीं बन जाता क्योंकि उसे किसी सार्वजनिक उपक्रम से सीमित वित्तीय सहायता मिलती है.
जस्टिस अमितेन्द्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के पुराने आदेशों को खारिज करते हुए कहा कि साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा फीस की कमी की भरपाई करना या ढांचागत मदद देना आरटीआई अधिनियम के तहत "पर्याप्त वित्तपोषण" (सब्सटेंशियल फाइनेंसिंग) की श्रेणी में नहीं आता है.
यह पूरा मामला डीएवी पब्लिक स्कूल, कोरबा से जुड़ा है, जिसने सीआईसी के उन आदेशों को चुनौती दी थी जिसमें स्कूल के प्रिंसिपल को "डीम्ड जन सूचना अधिकारी" (PIO) मानते हुए ₹5,000 का जुर्माना लगाया गया था.
दरअसल, एक आवेदक ने एसईसीएल के माध्यम से स्कूल के आंतरिक प्रशासन और सेवा मामलों की जानकारी मांगी थी. स्कूल का पक्ष था कि उसका संचालन दिल्ली की एक पंजीकृत सोसायटी करती है और एसईसीएल का उस पर कोई प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है.
एसईसीएल केवल अपने कर्मचारियों के बच्चों की रियायती फीस के अंतर का भुगतान करता है. दूसरी ओर, आवेदक का तर्क था कि स्कूल को एसईसीएल से जमीन और ढांचागत सहयोग मिलता है, इसलिए यह आरटीआई के दायरे में आना चाहिए.
हाई कोर्ट ने आरटीआई अधिनियम की धारा 2(h) और सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि किसी संस्था को लोक प्राधिकारी मानने की मुख्य शर्त यह है कि वह सरकार द्वारा स्वामित्व, नियंत्रित या पर्याप्त रूप से वित्तपोषित हो.
अदालत ने पाया कि डीएवी स्कूल न तो सरकार या एसईसीएल के स्वामित्व में है और न ही उस पर किसी प्रकार का सरकारी नियंत्रण है. स्कूल अपने संसाधन खुद जुटाता है.
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक कोई संस्था मूल रूप से लोक प्राधिकारी न हो, तब तक उसके अधिकारियों पर आरटीआई के तहत वैधानिक दायित्व नहीं थोपे जा सकते. इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने सीआईसी के आदेशों को रद्द कर दिया, हालांकि यह भी साफ किया कि आवेदक अन्य कानूनी मंचों पर अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए स्वतंत्र है.