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850 सदस्यों वाली लोकसभा के लिए विधेयक पर 16 को बहस

850 सदस्यों वाली हो सकती है लोकसभा

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14 अप्रै. 2026, 04:07 PM 6 मिनट में पढ़ें 1

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नई दिल्ली | डेस्क : अगर सब कुछ ठीक रहा तो 543 सदस्यों वाली लोकसभा जल्दी ही 850 सदस्यों वाली हो सकती है. केंद्र सरकार एक बड़ा संवैधानिक बदलाव करने की तैयारी में है. इसके लिए उसने “संविधान (एक सौ इकतीसवां संशोधन) विधेयक, 2026” नाम से एक प्रस्ताव रखा है. इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य लोकसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ाना है.


अभी लोकसभा में कुल 543 सदस्य होते हैं, लेकिन सरकार इसे बढ़ाकर 850 तक करना चाहती है. यानी देश की संसद के निचले सदन में पहले से कहीं ज्यादा प्रतिनिधि होंगे. इस विधेयक पर चर्चा के लिए संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है, जो 16 और 17 अप्रैल को होगा.

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इस प्रस्ताव में संविधान के कुछ अहम अनुच्छेदों में बदलाव करने की बात कही गई है. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अनुच्छेद 82 से जुड़ा है. अभी तक व्यवस्था यह है कि हर जनगणना के बाद चुनाव क्षेत्रों यानी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण (जिसे परिसीमन कहते हैं) किया जाता है. लेकिन इस अनुच्छेद में एक विशेष प्रावधान है, जिसके अनुसार अगला परिसीमन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर ही किया जाना अनिवार्य है.


सरकार इस अनिवार्यता को खत्म करना चाहती है. प्रस्तावित संशोधन के तहत इस प्रावधान को पूरी तरह हटाया जाएगा. इसका सीधा मतलब यह होगा कि परिसीमन करने के लिए 2026 के बाद की जनगणना का इंतजार करना जरूरी नहीं रहेगा. यानी सरकार चाहे तो 2026-27 की जनगणना से पहले उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर भी निर्वाचन क्षेत्रों का नया निर्धारण कर सकती है.


एक और बड़ा बदलाव अनुच्छेद 81 में प्रस्तावित है. इसके अनुसार लोकसभा में राज्यों से चुने जाने वाले सदस्यों की अधिकतम संख्या 815 तक हो सकती है. वहीं केंद्र शासित प्रदेशों से अधिकतम 35 सदस्य चुने जा सकेंगे. इन केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का चुनाव किस तरह होगा, यह संसद कानून बनाकर तय करेगी.


इस पूरे बदलाव का एक महत्वपूर्ण असर महिलाओं के आरक्षण पर भी पड़ सकता है. अगर जनगणना और परिसीमन के बीच का संबंध हटा दिया जाता है, तो महिलाओं के लिए 1/3 यानी एक तिहाई सीटों का आरक्षण लागू करने में तेजी आ सकती है.


यह समझना जरूरी है कि सितंबर 2023 में एक और संवैधानिक संशोधन किया गया था, जिसे संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 कहा जाता है. इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसे लागू करने की शर्त यह थी कि पहले जनगणना हो और उसके बाद परिसीमन किया जाए. यानी महिलाओं का आरक्षण सीधे लागू नहीं हो सकता था, उसे जनगणना और परिसीमन से जोड़ा गया था.


अब नए विधेयक में अनुच्छेद 334ए में बदलाव का प्रस्ताव है, ताकि परिसीमन होते ही महिलाओं के लिए 1/3 आरक्षण तुरंत लागू किया जा सके. इसका मतलब यह है कि महिलाओं को राजनीति में प्रतिनिधित्व देने की प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश की जा रही है.


इसके साथ ही सरकार एक और बड़ा कदम उठाने जा रही है. वह परिसीमन अधिनियम, 2002 को खत्म करना चाहती है और उसकी जगह एक नया कानून “परिसीमन विधेयक, 2026” लाना चाहती है. इस नए कानून के तहत एक नया परिसीमन आयोग बनाया जाएगा.


यह आयोग बहुत महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि यही तय करेगा कि देश में चुनाव क्षेत्र कैसे बनेंगे और किस राज्य को कितनी सीटें मिलेंगी. इस आयोग की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के एक वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे. इसके अलावा इसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित कोई निर्वाचन आयुक्त सदस्य होगा. साथ ही संबंधित राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त भी इसमें शामिल रहेगा.


हर राज्य के लिए आयोग को काम में मदद देने के लिए 10 अतिरिक्त सदस्य भी जोड़े जाएंगे. इनमें 5 लोकसभा या राज्यसभा के सदस्य (सांसद) और 5 राज्य विधानसभा के सदस्य होंगे. इन्हें संबंधित सदनों के अध्यक्ष द्वारा नामित किया जाएगा. हालांकि इन सदस्यों को आयोग के फैसलों में वोट देने का अधिकार नहीं होगा और वे अंतिम निर्णय पर हस्ताक्षर भी नहीं कर सकेंगे. उनका काम केवल सलाह देना होगा.


इस नए प्रस्ताव के तहत परिसीमन का आधार नवीनतम जनगणना के आंकड़े होंगे. यानी देश की ताजा आबादी को ध्यान में रखते हुए सीटों का बंटवारा और चुनाव क्षेत्रों का निर्धारण किया जाएगा. अभी की स्थिति यह है कि लोकसभा में सीटों का जो बंटवारा है, वह 1971 की जनगणना के आधार पर तय किया गया था. वहीं निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं 2001 की जनगणना के आधार पर बनाई गई थीं. लेकिन तब से देश की जनसंख्या में काफी बदलाव आ चुका है, इसलिए सरकार इसे अपडेट करना चाहती है.


परिसीमन आयोग कई महत्वपूर्ण काम करेगा. यह तय करेगा कि लोकसभा में हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को कितनी सीटें मिलेंगी. इसके अलावा यह राज्य विधानसभाओं में कुल सीटों की संख्या भी तय करेगा. साथ ही अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए कितनी सीटें आरक्षित होंगी, यह भी आयोग ही निर्धारित करेगा.


इसके अलावा आयोग यह भी तय करेगा कि संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं कैसी होंगी. इसमें ध्यान रखा जाएगा कि निर्वाचन क्षेत्र भौगोलिक रूप से सघन हों, यानी बहुत ज्यादा बिखरे हुए न हों. साथ ही प्रशासनिक सीमाओं, जैसे जिले या तहसील की सीमाएं, संचार सुविधाएं (जैसे सड़क और परिवहन) और आम जनता की सुविधा का भी ध्यान रखा जाएगा.


इस विधेयक की एक खास बात यह भी है कि इसमें महिलाओं के लिए लगभग एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का स्पष्ट प्रावधान है. इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए भी आरक्षण शामिल होगा. यानी अगर किसी सीट को SC या ST के लिए आरक्षित किया गया है, तो उसमें भी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण लागू होगा.


महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें स्थायी नहीं रहेंगी. इन्हें अलग-अलग चुनावों में बदल-बदल कर लागू किया जाएगा, जिसे रोटेशन कहा जाता है. यानी एक चुनाव में जो सीट महिला के लिए आरक्षित होगी, वह अगले चुनाव में किसी दूसरी सीट को दी जा सकती है. इसी तरह SC और ST वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों में भी रोटेशन लागू होगा.


इस विधेयक में यह भी कहा गया है कि परिसीमन आयोग जो आदेश जारी करेगा, वह भारत के राजपत्र में प्रकाशित होते ही कानून के बराबर प्रभावी हो जाएगा. यानी उसके फैसलों को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी. यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि परिसीमन की प्रक्रिया में अनावश्यक देरी या विवाद न हो.


हालांकि एक महत्वपूर्ण बात यह भी है कि जब तक वर्तमान लोकसभा या कोई राज्य विधानसभा भंग नहीं होती, तब तक मौजूदा प्रतिनिधित्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा. यानी नए नियम तुरंत लागू नहीं होंगे, बल्कि अगला चुनाव होने पर ही इनका प्रभाव दिखेगा.


इसी तरह अगर किसी सीट पर उपचुनाव होता है, तो वह पुराने परिसीमन के आधार पर ही कराया जाएगा. नए नियम केवल तब लागू होंगे, जब नई लोकसभा या नई विधानसभा का गठन होगा.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP