नेपाल में अशांति: भारत की 'पड़ोसी पहले' नीति के लिए चुनौती- NYT
नई दिल्ली । डेस्क: दक्षिण एशिया में बढ़ती अस्थिरता भारत के वैश्विक महाशक्ति बनने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्रभावित कर रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में हाल की उथल-पुथल भारत की 'पड़ोसी पहले' नीति के लिए नई चुनौतियां पेश कर रही है.
नेपाल में इस महीने भड़के विरोध प्रदर्शनों ने हिमालयी राष्ट्र को अस्थिर कर दिया है. भ्रष्टाचार, अभिजात्यवाद और बढ़ती असमानता के खिलाफ युवाओं के गुस्से ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया.
कुछ हफ्ते पहले ही भारत ने ओली को नई दिल्ली में राजकीय दौरे के लिए आमंत्रित किया था, ताकि दोनों देशों के बीच तनावपूर्ण संबंधों को बेहतर किया जा सके. हालांकि, यह दौरा रद्द हो गया.
दक्षिण एशिया में ऐसी अस्थिरता कोई नई बात नहीं है. पिछले साल बांग्लादेश में एक जन-आंदोलन ने शेख हसीना की सत्तावादी सरकार को उखाड़ फेंका, जबकि 2022 में श्रीलंका में आर्थिक संकट के कारण एक राजनीतिक वंश के राष्ट्रपति को सत्ता छोड़नी पड़ी.
ये घटनाएं भारत के लिए एक चेतावनी हैं, क्योंकि वह अपने पड़ोस में स्थिरता बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है.
न्यूयार्क टाइम्स के हवाले से विश्लेषकों का कहना है कि भारत अपने छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर पड़ोसियों के साथ संबंधों में संतुलन बनाए रखने में विफल रहा है. नेपाल जैसे देश अक्सर मानवीय सहायता और आर्थिक स्थिरता के लिए भारत पर निर्भर रहते हैं, लेकिन साथ ही वे भारत के उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से नाराज भी रहते हैं.
कनाडा की एशिया पैसिफिक फाउंडेशन के वरिष्ठ फेलो माइकल कुजेलमैन ने कहा, "भारत यह मानकर निश्चिंत नहीं हो सकता कि पड़ोसियों की नकारात्मक भावनाएं उनकी जरूरतों के कारण बेअसर हो जाएंगी. क्षेत्रीय उथल-पुथल नए नेताओं को जन्म दे सकती है, जो भारत के हितों के खिलाफ हो सकते हैं."
भारत की 'पड़ोसी पहले' नीति दक्षिण एशिया के देशों-नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, पाकिस्तान और मालदीव-के साथ आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने पर केंद्रित है. यह क्षेत्र विश्व की एक-चौथाई आबादी का घर है और इसमें सबसे बड़ी युवा आबादी है.
भारत के पूर्व राजदूत गौतम बंबावाले ने कहा, "भारत का प्रस्ताव यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, और हमारे साथ साझेदारी करके आप भी विकास कर सकते हैं."
हालांकि, भारत के पड़ोसी देशों ने इस नीति को हमेशा आसान नहीं बनाया. पश्चिम में पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं. पूर्व में बांग्लादेश, जिसकी आबादी 17 करोड़ है, भारत-विरोधी उग्रवादियों को पनाह देने और 4,023 किलोमीटर लंबी सीमा पर अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर भारत के साथ विवाद में रहा है.
दक्षिण में श्रीलंका ने भारत के राष्ट्रीय हितों को चुनौती देते हुए एक रणनीतिक जलमार्ग पर चीन द्वारा वित्तपोषित बंदरगाह को आमंत्रित किया.
भारत ने कुछ पड़ोसी देशों में विशिष्ट राजनीतिक नेताओं का समर्थन करके भी संबंधों को जटिल बनाया है. बांग्लादेश में शेख हसीना के पतन के बाद वहां भारत के साथ संबंध बिगड़ गए हैं. नए नेता मुहम्मद यूनुस ने चीन के साथ कई व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं.
इसके अलावा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद की नीति ने बांग्लादेश और मालदीव में मुस्लिम आबादी और श्रीलंका में बौद्ध समुदायों के बीच नाराजगी पैदा की है. पाकिस्तान के पूर्व राजदूत हुसैन हक्कानी ने कहा, "हिंदुत्व भारत में एकता का आधार हो सकता है, लेकिन यह पड़ोसी देशों में अन्य धार्मिक समूहों को आकर्षित नहीं करता."
न्यूयार्क टाइम्स के हवाले से खबर है कि विश्लेषकों का मानना है कि पड़ोसी देशों में सत्ता का शून्य या नेतृत्व की कमी भारत के हितों को और नुकसान पहुंचा सकती है. इससे चीन को भारत के पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र में, हिमालय से लेकर हिंद महासागर तक, ऊर्जा, निर्माण और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए फंडिंग प्रदान करके अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका मिल रहा है.