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नेपाल: क्या बालेन्द्र शाह Gen Z के डर से छात्रसंघों को बैन कर रहे हैं ?

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14 अप्रै. 2026, 01:49 AM 5 मिनट में पढ़ें 2

बालेन्द्र शाह
बालेन्द्र शाह

नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल की राजनीति में एक नए युग की आहट के साथ ही एक बड़ा संवैधानिक और लोकतांत्रिक संकट गहराता दिख रहा है. प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की कैबिनेट ने एक चौंकाने वाला फैसला लेते हुए 60 दिनों के भीतर सभी शैक्षणिक संस्थानों से दलीय संबद्धता वाले छात्र संगठनों को हटाने और उनके ढांचों को ध्वस्त करने का आदेश दिया है. इस फैसले ने न केवल नेपाल के छात्र नेताओं को आक्रोशित कर दिया है, बल्कि राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या बालेन्द्र शाह अपनी ही जड़ों को काटने की कोशिश कर रहे हैं? 


यह विडंबना ही है कि बालेन्द्र शाह खुद उस 'Gen Z' और युवा पीढ़ी के गुस्से और बदलाव की चाहत के प्रतीक बनकर उभरे, जिसने पारंपरिक राजनीति को नकारते हुए उन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुँचाया. आज वही प्रधानमंत्री छात्र संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर क्या उस आवाज को कुचलना चाहते हैं जिसने उन्हें जन्म दिया? 

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यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनियाभर में छात्रसंघों को लोकतंत्र की नर्सरी माना जाता है, जहाँ से भविष्य के राजनेता निकलते हैं. यदि राजनीति की इस उत्पत्ति स्थली पर ही ताला लगा दिया गया, तो आने वाले समय में नेपाल को नए और प्रखर नेतृत्व की आपूर्ति कैसे होगी?


बालेन्द्र शाह की 100 सूत्रीय कार्ययोजना के पीछे तर्क दिया गया है कि गिरते शैक्षणिक स्तर और अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए यह अनिवार्य है. सरकार 'छात्र परिषद' जैसे वैकल्पिक ढांचे की बात कर रही है, लेकिन छात्र नेताओं का मानना है कि यह केवल एक दिखावा है. असल में, यह डर 'Gen Z' के उस संभावित प्रतिरोध से है जो किसी भी सरकार की जवाबदेही तय करने की क्षमता रखता है. 


प्रधानमंत्री को शायद इस बात का बखूबी अहसास है कि जिस तरह युवा पीढ़ी ने पुराने दिग्गजों को सत्ता से बेदखल कर उन्हें चुना, वही पीढ़ी उनकी नीतियों के खिलाफ भी खड़ी हो सकती है. 


ऐसे में छात्रसंघों को भंग करना किसी भी संगठित विरोध की संभावना को जड़ से खत्म करने की एक सोची-समझी रणनीति प्रतीत होती है. जब कैंपस में कोई संगठित राजनीतिक आवाज ही नहीं होगी, तो सरकार के खिलाफ कोई सामूहिक आंदोलन परवान नहीं चढ़ पाएगा. यह कदम एक तरह से भविष्य के 'बालेन्द्र शाहों' के उदय के रास्ते को बंद करने जैसा है.


राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि बालेन्द्र शाह संसद के भीतर और बाहर अपनी स्थिति को अभेद्य बनाना चाहते हैं. वर्तमान में नेपाल की संसद में पारंपरिक विपक्षी दल भले ही कमजोर दिख रहे हों, लेकिन उनकी असली ताकत उनके छात्र विंग में बसती है. 


अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र छात्र संघ (ANNFSU) और नेपाल छात्र संघ जैसे संगठन न केवल विश्वविद्यालयों में सक्रिय हैं, बल्कि वे जनता के बीच किसी भी सरकारी फैसले के खिलाफ माहौल बनाने की क्षमता रखते हैं. प्रधानमंत्री को शायद यह डर सता रहा है कि यदि संसद में विपक्ष की आवाज धीमी भी पड़ जाए, तो ये छात्र संगठन सड़कों पर सरकार की नाक में दम कर सकते हैं. 


छात्रसंघों पर प्रतिबंध लगाने का अर्थ है उस मध्यम दर्जे के नेतृत्व को खत्म करना जो राजनीतिक दलों और आम जनता के बीच एक सेतु का काम करता है. यह लोकतंत्र की उन बुनियादी आवाजों को दबाने की कोशिश है जो सत्ता के केंद्रीकरण को चुनौती देती हैं.


संविधान की धारा 17 के तहत संघ और संगठन बनाने की स्वतंत्रता एक मौलिक अधिकार है, जिसे छात्र नेता अपनी ढाल बना रहे हैं. दीपक धामी और बिजय सापकोटा जैसे नेताओं का तर्क है कि छात्र आंदोलन ने नेपाल में पंचायत शासन से लेकर गणतंत्र की स्थापना तक ऐतिहासिक भूमिका निभाई है. 


यदि छात्र राजनीति को "गंदा" मानकर प्रतिबंधित किया जाता है, तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ होगा. 


हालांकि, सरकार के समर्थक और कुछ शिक्षाविद इसे 'शुद्धिकरण' का नाम दे रहे हैं, लेकिन यह तर्क गले नहीं उतरता कि सुधार के नाम पर लोकतांत्रिक अधिकारों की बलि दी जाए. अगर छात्र राजनीति में विसंगतियां हैं, तो उन्हें विनियमित किया जाना चाहिए न कि पूरी तरह समाप्त. 


बालेन्द्र शाह द्वारा छात्र आंदोलनों को "अपरिपक्व" या "बाधक" मानना उनकी अपनी उस छवि के विपरीत है, जिसमें वे युवाओं के मसीहा बनकर उभरे थे. क्या एक युवा प्रधानमंत्री इतना असुरक्षित हो गया है कि वह अपने ही देश के भविष्य को राजनीति की ककहरा सीखने से रोकना चाहता है?


अंततः, यह पूरा घटनाक्रम नेपाल के लोकतंत्र के लिए एक खतरे की घंटी है. यदि शिक्षण संस्थानों से वैचारिक विमर्श और राजनीतिक चेतना को बाहर कर दिया गया, तो कैंपस केवल डिग्री बांटने वाली मशीनें बनकर रह जाएंगे. 


बालेन्द्र शाह को यह नहीं भूलना चाहिए कि दमन कभी भी बदलाव की लहर को रोक नहीं पाया है. छात्रसंघों पर प्रतिबंध लगाने की उनकी कोशिश उन्हें एक सुधारवादी नेता के बजाय एक ऐसे शासक के रूप में स्थापित कर सकती है जो सत्ता के मद में अपनी ही उत्पत्ति के आधार को भूल गया है. 


क्या वे सच में शिक्षा को राजनीति से मुक्त करना चाहते हैं, या फिर वे उस 'Gen Z' की चिंगारी से डरे हुए हैं जो किसी भी वक्त सत्ता के सिंहासन को फिर से चुनौती दे सकती है? 


लोकतंत्र में आवाजों को दबाना सुधार नहीं, बल्कि अधिनायकवाद की ओर पहला कदम होता है, और नेपाल का इतिहास गवाह है कि यहाँ के छात्र कभी चुप नहीं बैठते. सरकार की यह 90 दिनों की समयसीमा कहीं नेपाल में एक बड़े छात्र विद्रोह की आधारशिला न बन जाए, क्योंकि जब युवाओं से संगठित होने का हक छीना जाता है, तो उनका आक्रोश अक्सर अनियंत्रित क्रांति का रूप ले लेता है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP