नेपाल की सत्ता का गणित: साधारण बहुमत बनाम दो-तिहाई 'सुपर मेजॉरिटी'
नई दिल्ली । डेस्क: नेपाल में प्रतिनिधि सभा के उपचुनावों के परिणामों ने राजनीति में एक नई 'वैकल्पिक लहर' का संकेत दिया है, जिसका नेतृत्व राष्ट्रिय स्वतंत्र पार्टी करती नजर आ रही है. जैसे-जैसे चुनावी रुझान स्पष्ट हो रहे हैं, पूरे देश का ध्यान अब संसद में सीटों के उन आंकड़ों पर टिक गया है जो तय करेंगे कि आने वाली सरकार केवल शासन करेगी या संविधान बदलने जैसी असाधारण शक्तियां भी रखेगी.
नेपाल के संवैधानिक ढांचे में साधारण बहुमत और दो-तिहाई बहुमत के बीच का अंतर केवल संख्या का नहीं, बल्कि राज्य के संचालन और न्यायिक नियंत्रण की शक्ति का है. नेपाल की संघीय संसद द्विसदनीय है, जिसमें 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा (निचला सदन) और 59 सदस्यों वाली राष्ट्रीय सभा (ऊपरी सदन) शामिल हैं.
निचले सदन में सरकार बनाने और सामान्य कानून पारित करने के लिए 138 सीटों का साधारण बहुमत पर्याप्त होता है, लेकिन जब बात 'सुपर मेजॉरिटी' यानी दो-तिहाई की आती है, तो यह आंकड़ा 184 सीटों तक पहुँच जाता है.
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, प्रतिनिधि सभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल करने वाले दल या गठबंधन के पास असाधारण अनुशासनात्मक और न्यायिक शक्तियां आ जाती हैं. अनुच्छेद 91(6)(सी) के तहत, निचला सदन अकेले अपने दो-तिहाई मतों से स्पीकर या डिप्टी स्पीकर को पदमुक्त कर सकता है. इतना ही नहीं, यह सदन मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, न्यायिक परिषद के सदस्यों और विभिन्न संवैधानिक निकायों के प्रमुखों के खिलाफ महाभियोग चलाकर उन्हें हटाने की क्षमता रखता है.
नेपाल के संविधान विशेषज्ञ भीमार्जुन आचार्य का मानना है कि दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार में विधायी प्रक्रिया अत्यंत सुगम हो जाती है और सरकार की स्थिरता की संभावना बढ़ जाती है, क्योंकि उसे बार-बार छोटे दलों के समर्थन पर निर्भर नहीं रहना पड़ता. हालांकि, वे यह भी चेतावनी देते हैं कि ऐसी स्थिति में विपक्ष की भूमिका नगण्य हो सकती है, जिससे सरकार की जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न लग सकता है.
वहीं, एक आम धारणा यह है कि निचले सदन में दो-तिहाई बहुमत मिलते ही संविधान को पूरी तरह बदला जा सकता है, जो कि पूरी तरह सही नहीं है. नेपाल के वरिष्ठ अधिवक्ता टीका राम भट्टराई और अन्य विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि संविधान संशोधन, राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति पर महाभियोग, राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा और महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधियों (विशेषकर राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमाओं से जुड़ी) के अनुसमर्थन के लिए संसद के दोनों सदनों प्रतिनिधि सभा और राष्ट्रीय सभा में दो-तिहाई बहुमत होना अनिवार्य है. भले ही निचला सदन बजटीय मामलों और सामान्य विधेयकों में ऊपरी सदन को बाईपास करने की शक्ति रखता हो, लेकिन संवैधानिक संशोधनों के लिए सहयोग की आवश्यकता बनी रहती है.
अंततः, जहाँ एक साधारण बहुमत सरकार को चलाने और जवाबदेह विपक्ष को बनाए रखने का मौका देता है, वहीं दो-तिहाई बहुमत दीर्घकालिक विधायी बदलावों और स्थिरता का मार्ग प्रशस्त करता है, बशर्ते इसका उपयोग लोकतांत्रिक गरिमा के साथ किया जाए.