अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले सामानों पर 29 गुना तक मुनाफा
नई दिल्ली । डेस्क: अस्पतालों में भर्ती मरीजों की मजबूरी का फायदा उठाकर मेडिकल उपकरणों और इस्तेमाल होने वाले सामानों (कंज्यूमेबल्स) को बेहद महंगे दामों पर बेचे जाने का एक बड़ा मामला सामने आया है. महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) ने मेडिकल उपकरणों पर लागत मूल्य से 29 गुना यानी करीब 2,800 प्रतिशत से अधिक का भारी-भरकम मुनाफा वसूले जाने का खुलासा किया है. राज्य के ड्रग रेगुलेटर ने इस मनमानी पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप करने और ट्रेड मार्जिन की सीमा तय करने की मांग की है.
आईवी सेट से लेकर पेसमेकर तक के दामों में भारी अंतर
महाराष्ट्र एफडीए के आयुक्त तुकाराम मुंढे द्वारा कराए गए एक सर्वे में मेडिकल कंज्यूमेबल्स के खरीद मूल्य (ट्रेड प्राइस) और उन पर छपे अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच हैरान करने वाला अंतर पाया गया है.
इंट्रावेनस (आईवी) इन्फ्यूजन सेट: जिस आईवी सेट का खरीद मूल्य केवल ₹11.05 है, उस पर एमआरपी ₹325 दर्ज की गई है, जो कि 2,814 प्रतिशत का मुनाफा दिखाता है.
सिरिंज: महज ₹6.75 में खरीदी जाने वाली सिरिंज मरीजों को ₹57.20 के एमआरपी पर बेची जा रही है.
कैथेटर: ₹29.41 की लागत वाले कैथेटर पर एमआरपी ₹310 छापी गई है.
स्टॉपकॉक: फैक्ट्री मूल्य ₹5.60 वाले इस उपकरण का एमआरपी ₹136 रखा गया है.
पेसमेकर: विदेशों से ₹25,000 में आयात किए जाने वाले पेसमेकर की बाजार में एमआरपी ₹2 लाख तय की गई है.
हार्ट वॉल्व: ₹4 लाख की लागत से देश में आने वाले हार्ट वॉल्व का एमआरपी सीधे ₹26 लाख अंकित किया गया है.
मरीजों की मजबूरी का उठाया जा रहा फायदा
तुकाराम मुंढे ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर इस स्थिति को सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया है. उनका कहना है कि अस्पताल के वार्ड में भर्ती मरीज या उनके रिश्तेदार इस बात से बिल्कुल अनजान होते हैं कि इस्तेमाल हो रहे सामान की वास्तविक लागत क्या है. जब कोई मरीज इलाज करा रहा होता है, तब उसके पास न तो कीमतों की तुलना करने का मौका होता है और न ही वह डिब्बे पर छपे एमआरपी पर कोई सवाल उठा सकता है. निर्माताओं और वितरकों द्वारा तय किया गया यह एमआरपी वास्तविक ट्रेड प्राइस से पूरी तरह कटा हुआ है.
उद्योग संगठन भी काफी समय से जता रहा है चिंता
एसोसिएशन ऑफ इंडियन मेडिकल डिवाइसेज (AIMED) भी पिछले दो वर्षों से केंद्र सरकार से इस अनियंत्रित मुनाफे पर रोक लगाने की गुहार लगा रहा है. संगठन का कहना है कि अस्पताल और आपूर्तिकर्ता (सप्लायर्स) उन्हीं कंपनियों के उत्पादों को तरजीह देते हैं, जिन पर एमआरपी 10 से 20 गुना ज्यादा छपी होती है. जो कंपनियां वाजिब दामों पर सामान बेचना चाहती हैं, उन्हें बाजार की इस होड़ से बाहर कर दिया जाता है या फिर प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए अत्यधिक एमआरपी छापने पर मजबूर किया जाता है.
महाराष्ट्र एफडीए ने इस सर्वे की पूरी रिपोर्ट, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) और फार्मास्युटिकल्स विभाग को भेज दी है, ताकि दवाओं और मेडिकल उपकरणों की कीमतों की एक पारदर्शी सीमा तय की जा सके.