महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ना गलत- राधा कुमार
नई दिल्ली । डेस्क: पूर्व दिल्ली पॉलिसी ग्रुप की निदेशक और प्रख्यात लेखिका राधा कुमार ने शुक्रवार को कहा कि विधायिकाओं में महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना से जोड़ना बिल्कुल भी आवश्यक नहीं था. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में उन्होंने स्पष्ट किया कि 33 प्रतिशत आरक्षण एक "फ्लैट रेट" है, जिसका संसद के आकार या जनसंख्या के आंकड़ों से कोई सीधा संबंध नहीं है.
उन्होंने तर्क दिया कि लोकसभा में चाहे वर्तमान की 543 सीटें हों या परिसीमन के बाद बढ़ने वाली 850 सीटें, महिलाओं के इस कोटे को तुरंत प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता था.
वेबिनार के दौरान राधा कुमार ने जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा करने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने जनसंख्या वृद्धि को सफलतापूर्वक नियंत्रित किया है, उन्हें परिसीमन के कारण नुकसान नहीं होना चाहिए.
उन्होंने भविष्य के परिसीमन के लिए एक व्यावहारिक फॉर्मूला सुझाते हुए कहा कि उन राज्यों को "पॉजिटिव पॉइंट्स" दिए जाने चाहिए जिन्होंने कल्याणकारी संकेतकों और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है.
इसके साथ ही उन्होंने लोकसभा की सीटें बढ़ाकर 850 करने पर भी चिंता जताई. उनका मानना है कि इतनी बड़ी संख्या होने से संसद की गुणवत्ता, गंभीर बहस और कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है, जिससे संसद महज एक 'रबर स्टैंप' बनकर रह सकती है.
इसी कार्यक्रम में शामिल वारंगल से कांग्रेस सांसद कडियाम काव्या ने कहा कि यदि महिला आरक्षण विधेयक को 2023 में पारित होने के बाद 2024 के आम चुनाव में ही लागू कर दिया जाता, तो आज संसद में महिलाओं को उनका हक मिल चुका होता.
उन्होंने भी उत्तर और दक्षिण भारत के बीच के जनसांख्यिकीय अंतर का हवाला देते हुए कहा कि जनसंख्या आधारित परिसीमन से दक्षिण के राज्यों को सजा नहीं मिलनी चाहिए.
वहीं, वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका रूही तिवारी ने जमीनी स्तर पर पंचायती राज में मिले महिला आरक्षण के सकारात्मक बदलावों को रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि शुरुआती दौर में भले ही इस पर तंज कसे गए हों, लेकिन इसने महिलाओं में राजनीतिक चेतना और लामबंदी को मजबूत किया है, जिसका गहरा असर आने वाले दशकों में दिखेगा.
एडीआर (ADR) द्वारा जारी एक हालिया रिपोर्ट में इस बात की पुष्टि की गई है कि चुनावी राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद निराशाजनक बना हुआ है. साल 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद भी राजनीतिक दलों की मानसिकता में कोई खास बदलाव नहीं आया है.
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, कानून बनने के बाद 2024 के लोकसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों में कुल 51,708 उम्मीदवारों ने भाग्य आजमाया, जिनमें से राजनीतिक दलों ने केवल 5,095 यानी महज 10 प्रतिशत महिलाओं को ही टिकट दिया.
वर्तमान स्थिति यह है कि 2023 के कानून के प्रावधानों के अनुसार, महिला आरक्षण को जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन से जोड़कर भविष्य के लिए टाल दिया गया है.