धूमकेतुओं से नहीं आई पृथ्वी पर जिंदगी: कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी का हालिया शोध
सदियों पुराने इस रोमांटिक विचार पर कि पृथ्वी पर जीवन के बीज धूमकेतुओं के जरिए अंतरिक्ष से आए थे, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
रायपुर । सीजीखबर डेस्क: पृथ्वी पर जीवन का पहला स्पर्श कैसे हुआ और क्या जीवन के शुरुआती यौगिक इस धरती के माहौल में बने थे या बाहरी अंतरिक्ष से आए थे, इन सवालों को लेकर विज्ञान जगत में लंबे समय से बहस जारी है. एक सदी से भी अधिक समय से वैज्ञानिकों का एक वर्ग यह मानता आया है कि जीवन के प्राथमिक जैविक तत्व धूमकेतुओं के साथ पृथ्वी पर पहुंचे थे. हालांकि, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के हालिया शोध ने इस लोकप्रिय सिद्धांत के सामने एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है.
एक लाख धूमकेतुओं के कंप्यूटर सिम्युलेशन में मिला निराशाजनक नतीजा
जीवन के बीज के रूप में धूमकेतुओं के आगमन की सच्चाई जानने के लिए कैम्ब्रिज के शोधकर्ताओं ने यांत्रिक साधनों से प्राचीन पृथ्वी के पर्यावरण और परिस्थितियों का कंप्यूटर सिम्युलेशन तैयार किया. 'साइंटिफिक रिपोर्ट्स' पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में जीवन की उत्पत्ति से ठीक पहले के पृथ्वी के वातावरण और धूमकेतुओं के टकराने की गति को कंप्यूटर की मदद से पुन निर्मित किया गया.
वैज्ञानिकों ने लगभग एक लाख धूमकेतुओं के गिरने का गणितीय परीक्षण किया, लेकिन लगभग हर प्रयोग असफल रहा. सिम्युलेशन के नतीजों से सामने आया कि धूमकेतुओं में मौजूद जीवन के बीज पृथ्वी के संपर्क में आने से पहले ही या टकराते ही पूरी तरह नष्ट हो गए.
हाइड्रोजन सायनाइड की मौजूदगी और टकराव का विनाशकारी असर
शोध में जीवन के मुख्य बीज के रूप में हाइड्रोजन सायनाइड रसायन पर ध्यान केंद्रित किया गया, जिससे लिपिड, शुगर, न्यूक्लियोबेस और न्यूक्लियोटाइड जैसे जैविक पदार्थ बनते हैं. कैम्ब्रिज के इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोनॉमी के वैज्ञानिक रिचर्ड एंसलो के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन के अनुसार, हाइड्रोजन सायनाइड सौर मंडल के लगभग सभी धूमकेतुओं में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है.
शोधकर्ताओं ने परीक्षण में देखा कि जब 30 से 50 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से धूमकेतु पृथ्वी से टकराते हैं, तो अत्यधिक गर्मी, वायुमंडलीय घर्षण या समुद्र के पानी में गिरने के कारण यह रसायन नष्ट हो जाता है. यद्यपि बहुत दुर्लभ मामलों में यह रसायन धरती तक पहुंचने में सफल हो सकता है, लेकिन जीवन की शुरुआत के लिए आवश्यक मात्रा की तुलना में यह बेहद नगण्य है.
सदियों पुरानी धारणा और अंतरिक्ष में नए ग्रहों की संभावनाएं
ब्रह्मांड में जीवन के बीजों के बिखरे होने का विचार सबसे पहले प्राचीन ग्रीक दार्शनिक एनाक्सागोरास ने दिया था और 1908 में नोबेल पुरस्कार विजेता स्वीडिश वैज्ञानिक स्वांते अर्हेनियस ने इसे सैद्धांतिक रूप दिया था. कैम्ब्रिज के शोधकर्ता स्पष्ट करते हैं कि इस अध्ययन से धूमकेतु सिद्धांत पूरी तरह खारिज नहीं होता, लेकिन इसकी संभावना बेहद क्षीण हो जाती है.
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि भविष्य में यह साबित भी हो जाए कि पृथ्वी पर धूमकेतुओं से जीवन नहीं आया, तो भी अन्य ग्रहों के लिए यह प्रक्रिया संभव हो सकती है. मंगल ग्रह का पतला वायुमंडल और वहां धूमकेतुओं की कम गति के कारण जैविक रसायनों के सुरक्षित पहुंचने की संभावना पृथ्वी की तुलना में पांच गुना अधिक है, जबकि शुक्र का घना वातावरण इन्हें पूरी तरह नष्ट कर देता है. पृथ्वी पर जीवन के रहस्य का पूरी तरह से उजागर होना फिलहाल भविष्य के शोध पर टिका है.