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मनुस्मृति से प्रेरित श्रम नीति: ट्रेड यूनियन ने जताई कड़ी आपत्ति

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29 अक्टू. 2025, 02:04 AM 4 मिनट में पढ़ें 1

मनुस्मृति
मनुस्मृति

नई दिल्ली । डेस्क: केंद्रीय श्रम मंत्रालय द्वारा तैयार ड्राफ्ट नेशनल लेबर एंड एम्प्लॉयमेंट पॉलिसी ने प्राचीन हिंदू ग्रंथ मनुस्मृति सहित अन्य शास्त्रों से 'प्रेरणा' लेने का दावा किया है. जिसे श्रमिक अधिकारों के विशेषज्ञों ने जाति-आधारित पदानुक्रम को मजबूत करने वाली और आधुनिक श्रमिक हितों के विपरीत बताते हुए कड़ा विरोध जताया है. नीति में श्रम को 'राजधर्म' करार दिया गया है, जो सामाजिक सद्भाव, आर्थिक समृद्धि और सामूहिक कल्याण को बनाए रखने का नैतिक कर्तव्य माना गया है.


नीति दस्तावेज के अनुसार, 'भारतीय दृष्टिकोण में श्रम केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि धर्म (नैतिक कर्तव्य) के व्यापक क्रम में योगदान है. कारीगर, किसान, शिक्षक या औद्योगिक मजदूर-हर श्रमिक सामाजिक सृजन के चक्र का अभिन्न अंग है.' इसमें मनुस्मृति, याज्ञवल्क्यस्मृति, नारदस्मृति और अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा गया है कि राजा का कर्तव्य न्याय, उचित मजदूरी सुनिश्चित करना और श्रमिकों का शोषण से बचाव करना है. नीति का नाम 'श्रम शक्ति नीति 2025' रखा गया है.  

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हालांकि, सरकार द्वारा वादा की गई सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा और नवाचार-उद्यमिता के माध्यम से रोजगार सृजन के दावों के विपरीत, वास्तविक प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. कार्यबल के मात्र 10 प्रतिशत औपचारिक श्रमिकों को ही भविष्य निधि, जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा जैसी सामाजिक सुरक्षा मिली हुई है, जबकि 90 प्रतिशत असंगठित श्रमिकों को अपनी व्यवस्था खुद करनी पड़ती है. राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम के तहत लगभग 2 करोड़ बुजुर्गों को केंद्र सरकार द्वारा दी जाने वाली पेंशन मात्र 200 रुपये मासिक है.


आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में नियमित नौकरियों के सृजन में गिरावट आई है. इसके विपरीत, 2018-19 से 2022-23 तक स्व-रोजगार में लगातार वृद्धि हुई है. यह आंकड़े सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा किए गए पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे पर आधारित हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2022-23 में कहा गया है कि नाममात्र मजदूरी में वृद्धि के बावजूद, मुद्रास्फीति के कारण वास्तविक मजदूरी (क्रय शक्ति) में नकारात्मक वृद्धि हो रही है. रिपोर्ट के अनुसार, 'ग्रामीण क्षेत्रों में वास्तविक मजदूरी वृद्धि नकारात्मक रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय वस्तु मूल्यों और घरेलू खाद्य मूल्यों में नरमी से भविष्य में इसमें सुधार की उम्मीद है.'


सीपीआई से संबद्ध ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी) ने ड्राफ्ट नीति पर तीखा प्रहार किया है. संगठन का आरोप है कि यह नीति ट्रेड यूनियनों से बिना परामर्श तैयार की गई है. एटक ने श्रम मंत्रालय से ड्राफ्ट तत्काल वापस लेने और केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ चर्चा शुरू करने की मांग की है. नीति में नौकरी की सुरक्षा, रोजगार सृजन और न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के अनुरूप अनिवार्य न्यूनतम मजदूरी जैसे विवादास्पद मुद्दों पर कोई उल्लेख नहीं है.


जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेंटर फॉर इंफॉर्मल सेक्टर एंड लेबर स्टडीज के फैकल्टी सदस्य प्रदीप शिंदे ने कहा, 'मजदूरी, श्रमिक अधिकार और शोषण से सुरक्षा जैसे आधुनिक अवधारणाएं औद्योगीकरण और पूंजीवाद के उदय के बाद पिछले दो शताब्दियों में विकसित हुईं. प्राचीन काल में जजमानी प्रथा थी, जहां श्रमिकों के पास कोई अधिकार नहीं थे. मजदूरी प्रणाली का अभाव था; काम के बदले उन्हें मुख्यतः अनाज में निर्वाह-स्तरीय पारिश्रमिक मिलता था. हिंदू ग्रंथों द्वारा प्रचारित श्रम (श्रम) की महिमा करना जाति-आधारित श्रम विभाजन को मजबूत करने का प्रयास है, जिसमें ब्राह्मणों को धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सर्वोच्च स्थान प्राप्त होता है.'


शिंदे ने आगे कहा, 'शास्त्रीय ग्रंथों में राजा शक्ति का प्रतीक होता था, लेकिन उसकी स्थिति ब्राह्मणों से अधीनस्थ थी. श्रम अधिकारों के संदर्भ में स्मृतियों का हवाला देना आरएसएस का ब्राह्मण वर्चस्व को पुनर्स्थापित करने का आक्रामक प्रयास है. श्रम को धर्म या राजधर्म से जोड़ना एक दोषपूर्ण विचार है, क्योंकि यह श्रमिकों के अधिकार, उचित मजदूरी और सुरक्षा को नजरअंदाज करता है.'


श्रमिक संगठनों और विशेषज्ञों की मांग है कि नीति को सार्वजनिक बहस के लिए अंतिम रूप देने से पहले व्यापक परामर्श किया जाए. सरकार की इस 'प्राचीन प्रेरणा' वाली नीति पर बहस तेज हो गई है, जो आधुनिक श्रमिक आंदोलन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकती है.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP