ज्योति मल्होत्रा केसः सच और झूठ रचता मीडिया और भ्रमित दर्शक
छत्तीसगढ़ ज्योति मल्होत्रा केस सच से ज्यादा भ्रम का छौंक लगाता मीडिया
रायपुर | ममता मानकरः हरियाणा की ट्रैवल ब्लॉगर/यू ट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की तरह-तरह की कहानियाँ सामने आ रही हैं. दर्शक या पाठक जब तक एक कहानी से रूबरू होते हैं, दूसरी कहानी अपडेट हो रही होती है.
वही ज्योति जिसे पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में रिमांड पर लिया गया है. दरअसल ट्रैवल विथ जो के नाम से यू ट्यूब चलाने वाली ज्योति को पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑपरेटिव्स (पीआइओ) के अधिकारियों के पास सूचनाओं के आदान-प्रदान के आरोप में रिमांड पर लिया गया है.
पुलिस द्वारा कहा गया है कि अभी तक सैन्य, रक्षा या राजनीतिक जानकारी तक पहुंच होने के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं. लेकिन टीवी चैनल और यू ट्यूब में काल्पनिक कहानियाँ जारी हैं.
अब तरह- तरह ही कहानियां सुनते हुए हिसार पुलिस ने खुद प्रेस रिलीज कर मीडिया से निवेदन किया है कि वे भ्रामक खबरों से बचें.
ये तथ्यहीन खबर ना सिर्फ अनुसंधान को प्रभावित करती हैं बल्कि ऐसे मामलों में सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को भी प्रभावित करती हैं.
तथ्यहीन खबरें न चलाने की सलाह- हिसार पुलिस
जासूसी के मामले में मीडिया-सोशल मीडिया में चल रही अफवाहों के बीच हिसार पुलिस ने विराम लगाने के लिए प्रेस रिलीज जारी किया है. हिसार, पुलिस अधीक्षक शशांक कुमार सावन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर मीडिया में चल रहीं भ्रामक खबरों से बचने की सलाह दी है और मीडिया से अनुरोध किया है कि ऐसी खबरें आधिकारिक पुष्टि के बाद ही चलाएं.
विज्ञप्ति के अनुसार-यह देखा जा रहा है कि अनुसंधान के दौरान प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर बहुत सी तथ्यहीन खबरें भी चल रही हैं.
तथ्यहीन खबर ना सिर्फ अनुसंधान को प्रभावित करती है बल्कि ऐसे मामलों में सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को भी प्रभावित करती है.
हिसार पुलिस ने लिखा है कि प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर फैली हुई कुछ अफवाहों का खण्डन करते हुए यह स्पष्ट किया जाता है कि, पूरे मामले की जांच हिसार पुलिस कर रही है.
आरोपी हिसार पुलिस की हिरासत में है. कुछ एजेंसियां समय-समय पर पूछताछ कर रही हैं. किसी भी संस्था को आरोपी की हिरासत नहीं सौंपी गई.
अभी सिर्फ जांच चल रही, किसी तथ्य की पुष्टि नहीं
जारी प्रेस विज्ञप्ति में हिसार पुलिस ने बताया कि ज्योति मल्होत्रा से पुलिस ने एक लैपटॉप और कुछ इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हासिल किए हैं. कुरुक्षेत्र की हरकीरत को पूछताछ के लिए बुलाया गया था.
पुलिस ने अन्य जानकारी साझा करते हुए फेक खबरों के लिए भी लिखा.
आरोपी की वॉट्सऐप चैट के बारे में किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं की जा सकती. आरोपी की डायरी या सार्वजनिक किए जा रहे उसके पन्ने पुलिस के पास नहीं हैं.
आरोपी की बैंक डिटेल्स हैं, लेकिन पैसों के लेन-देन के बारे में अभी कुछ नहीं कहा जा सकता. आरोपी पीआईओएस के संपर्क में थी.
लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी आतंकवादी संगठन के संपर्क में थी. पुलिस ने जो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हासिल किए हैं, उन्हें फॉरेंसिक लैब भेजा गया है, जहां विश्लेषण जारी है.
आरोपी की पीआईओ से शादी या धर्म परिवर्तन का कोई तथ्य अभी तक सामने नहीं आया है.
हर साल हजारों लोग पाकिस्तान जाते
पिछले कुछ दिनों में लगातार जासूसी के नाम हो रही गिरफ्तारी के बीच एक और नाम की चर्चा है वो हैं एमबीबीएस डॉ से यूट्यूबर बने नवांकुर चौधरी की.
इनकी भी कई-कई खबरें मिलेंगी जिसे लेकर नवांकुर ने खुद सफाई दी है.
नवांकुर ने कहा मैं पाकिस्तान हाई कमीशन क्यों गया था? जितने भी यूट्यूबर पाकिस्तान विजिट करके आते हैं, पाकिस्तान एंबेसी उन्हें बुलाती है. मैं अकेला नहीं था, वहां लगभग 700-800 लोगों की गैदरिंग थी.
उसमें से 500 लोग इंडिया से थे. 50 से 60 दूसरे देशों के डिप्लोमैट्स भी थे. मेरे साथ फोटो में एक सरदार जी दिख रहे हैं, वह भी यूट्यूबर थे.
मैं कोई स्पेशल डिनर करने के लिए नहीं गया था. मुझे स्पेशल नहीं बुलाया गया था. पाकिस्तान हर साल हजारों लोग जाते हैं. हिंदू और सिख जत्था जाता है.
उनके ऑर्गेनाइजर्स को भी पाकिस्तान इनवाइट करता था. मैं यूट्यूबर हूं, इसलिए हाईलाइट हो रहा हूं. जिन-जिन पर पुलिस को शक था, उन लोगों को गिरफ्तार किया गया है.
मुझ पर शक नहीं था तो मुझे गिरफ्तार नहीं किया गया है. मुझ पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है.
भारतियों में असली-नकली के बीच अंतर की क्षमता में कमी
असल में नया दिखाने और ब्रेकिंग की अंधी दौड़ ने, पत्रकारिता के पेशे में काल्पनिक कहानियों की बाढ़ ला दी है. जिनकी काल्पनिक कहानियों की दौड़ जितनी है, वह उतनी कहानियाँ गढ़ रहा है.
हाल ही में किया गया एक अध्यययन बताता है कि भारतीयों में असली और नकली जानकारी के बीच अंतर करने की क्षमता सबसे कमज़ोर है. इसमें कहा गया है कि भारतीयों में डिफ़ॉल्ट रूप से समाचार को सच मानने की अधिक संभावना है.
पेरिस स्थित मार्केट रिसर्च फर्म इप्सोस ग्रुप के अध्ययन पर आधारित एक रिपोर्ट पिछले महीने प्रकाशित हुई थी, जिसमें यह समझने पर ध्यान केंद्रित किया गया था कि लोगों की असली खबरों को नकली खबरों से अलग करने की क्षमता किस तरह से प्रभावित होती है.
भारत, अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में 8,800 लोगों पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारतीय लोग फर्जी खबरों और गलत सूचनाओं के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं.
अध्ययन में शामिल 8,800 प्रतिभागियों को कुछ असली और नकली हेडलाइन दिखाई गईं. असली हेडलाइनें विश्वसनीय समाचार आउटलेट्स से थीं, जबकि नकली हेडलाइनें फैक्ट चेकिंग साइटों से थीं.
शीर्षकों को सामान्य सोशल मीडिया पोस्ट की तरह बनाया गया था, जिसमें कोई स्रोत नाम, कोई लाइक और कोई टिप्पणी नहीं थी. ऐसा प्रतिभागियों को शीर्षकों के आधार पर समाचार की सत्यता का अंदाजा लगाने के लिए किया गया था.
गलत सूचनाओं के प्रति ज़्यादा संवेदनशील
रिपोर्ट में कहा गया कि डिजिटल परिदृश्य के विकास के कारण गलत सूचना का पैमाना और जटिलता तेजी से बढ़ी है. उपयोगकर्ता की सहभागिता को अधिकतम करने के लिए डिज़ाइन किए गए एल्गोरिदम अनजाने में सनसनीखेज या विभाजनकारी सामग्री को बढ़ा सकते हैं, अगर उनका डिज़ाइन वायरलिटी को प्राथमिकता देता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीयों में सुर्खियों पर यकीन करने की संभावना ज़्यादा होती है, ख़ास तौर पर अगर वे सकारात्मक भावनाओं को जगाती हैं, लेकिन वे नकारात्मक लोगों के प्रति कम संदेह दिखाते हैं.
इसमें कहा गया है कि निर्णय पर यह भावनात्मक प्रभाव भारत में लोगों को भावनात्मक रूप से आवेशित गलत सूचनाओं के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बनाता है.
कई चैनलों ने माफ़ी भी मांगीरिपोर्ट में कहा गया है कि जब भारतीयों को असली खबरें दी जाती हैं, तो वे उसे सच के रूप में पहचान लेते हैं.
इससे पता चलता है कि गलत सूचनाओं से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद, भारत के लोगों में सच्चाई को पहचानने की एक मजबूत आधारभूत क्षमता है.
अध्ययन में पाया गया कि भारतीयों में असली खबरों को पहचानने की सटीकता अन्य देशों के बराबर है.
हाल ही में भारत पाकिस्तान सैन्य तनाव के बीच सरकार की ही पीआईबी फैक्ट चैक सहित अन्य निजी वेबसाईट फैक्ट्स, बूम ने लगतार फर्जी खबरों के तथ्य जांचते हुए सच बताया.
कई चैनलों ने माफ़ी भी मांगी. लेकिन भारत में फर्जी ख़बरें व गलत कवरेज की कोई सीमा तो है नहीं.
सुशांत के मामले में सुभाष चन्द्रा की माफी
याद करिए, बॉलीवुड अभिनेता रहे सुशांत सिंह सुसाइड केस में भी यही देखने को मिला था. बीते दिनों इस मामले में रिया चक्रवर्ती को सीबीआई ने सुशांत के केस की क्लोजर रिपोर्ट जारी करते हुए क्लीन चिट दिया गया. जिसके बाद जी न्यूज़ के मेंटर सुभाष चन्द्रा ने माफ़ी मांगी थी.
जी के फाउंडर सुभाष चंद्र ने ऑफिशियल X प्लेटफॉर्म (पहले ट्विटर) पर लिखा- सुशांत सिंह राजपूत के मर्डर केस में CBIने क्लोजर रिपोर्ट फाइल की है. मुझे लगता है ये सबूतों की कमी के आधार पर है.
अस्पष्टता की कोई गुंजाइश नहीं है, जिसका अर्थ है कि कोई केस नहीं बनता है. पीछे पलटकर देखने पर लगता है कि जी न्यूज के एडिटर्स और रिपोर्टर्स (उस समय के) के नेतृत्व में मीडिया ने रिया चक्रवर्ती को आरोपी बनाया है लोगों ने भी जी न्यूज को फॉलो किया.
जी न्यूज का मेंटॉर होने के नाते मैंने उन्हें सलाह दी है कि साहस जुटाएं और माफी मांगे. मैं रिया चक्रवर्ती से माफी मांगता हूं, जबकि मेरा इससे कोई लेना देना नहीं था.
मैं एक मुख रुद्राक्ष की तरह हूं, बाहर और अंदर एक समान. सच को सच कहो.बेबुनियाद आरोपों से लोगों को जलील करता मीडिया
प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक मीडिया में चल रही ख़बरों को लेकर हिसार पुलिस ने जो प्रेस रिलीज जारी किया वो यह बताता है कि देश में मीडिया की कवरेज या झूठी ख़बरों को लेकर प्रेस इंडेक्स में भारत की स्थिति देखने की जरूरत नही है.
हमारे देश की मीडिया किसी भी मामले में कथित आरोपी को खुद ही जजमेंट पास कर आरोप सिद्ध करने की सारी कवायद कर डालती है.
और फिर जैसा कि हमने हालिया अध्यययन का जिक्र किया कि कैसे भारतीयों में असली और नकली जानकारी के बीच अंतर करने की सबसे कमज़ोर क्षमता है, हम इस कल्पनालोक वाली मीडिया को सच मान बैठते हैं.
जैसे ज्योति मल्होत्रा के मामले में बिना किसी तथ्य के, नई नई कहानियां गढ़ी जा रही हैं. ऐसे ही रिया चक्रवर्ती को किसी भी जांच या आरोप तय होने या मुकदमा चलाए जाने से बहुत पहले ही मीडिया द्वारा उन्हें दोषी घोषित कर दिया गया.
उनके मामले को लेकर मीडिया का उन्माद इस बात का एक ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे आरोपी व्यक्तियों को बिना किसी मुकदमे के सार्वजनिक रूप से जलील किया जाताअभियुक्तों की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा जरूरी
दरअसल, भारत को ऐसे कानून की आवश्यकता है जो अभियुक्तों की गोपनीयता और गरिमा की रक्षा करे यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स जैसे देशों में सख्त नियम हैं जो पुलिस को औपचारिक आरोपों से पहले अभियुक्तों की पहचान उजागर करने से रोकते हैं.
भारत को भी इसी तरह की नियमों को अपनाना चाहिए. पुलिस सुधार आवश्यक है और अभियुक्तों के अधिकारों को बनाए रखने के लिए कानून प्रवर्तन को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
आंतरिक दिशा-निर्देशों में अभियुक्तों की सार्वजनिक परेड पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, साथ ही उल्लंघन करने वालों के लिए दंड भी होना चाहिए.
जवाबदेही तंत्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इन मानदंडों का उल्लंघन करने वाले अधिकारियों को भी दंड भुगतना पड़ा.
दिशा-निर्देशों का हो रहा उल्लंघन
इसी तरह, अदालतों को भी ऐसे मामलों में गैग ऑर्डर यानी जिसे गैगिंग ऑर्डर या सप्रेशन ऑर्डर के रूप में भी जाना जाता है, वह भी जारी करना चाहिए.
यह एक आदेश है, आमतौर पर अदालत या सरकार द्वारा दिया जाने वाला एक कानूनी आदेश, जो सूचना या टिप्पणी को सार्वजनिक करने या किसी अनधिकृत तीसरे पक्ष को दिए जाने पर प्रतिबंध लगाता है.
लेकिन भारत में अभियुक्तों की निजता और गरिमा की रक्षा के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचे का अभाव है. हालांकि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और अदालती दिशा-निर्देश कुछ सुरक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन उनका नियमित रूप से उल्लंघन किया जाता है.
सीआरपीसी की धारा 303 अभियुक्त को कानूनी प्रतिनिधित्व के अधिकार की गारंटी देती है, जबकि अनुच्छेद 20(3) आत्म-दोषी ठहराए जाने से सुरक्षा प्रदान करता है.
लेकिन जब जनता की राय न्याय के मार्ग को निर्धारित करती है तो ये अधिकार निरर्थक हो जाते हैं.
जैसे सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम सेबी (2012) में, सर्वोच्च न्यायालय ने पक्षपातपूर्ण मीडिया कवरेज से होने वाले नुकसान को स्वीकार किया.
इसने संवेदनशील मामलों में प्रकाशन स्थगित करने के लिए दिशा-निर्देश निर्धारित किए.
हालाँकि, इन दिशा-निर्देशों का मीडिया की ज्यादतियों को रोकने में बहुत कम प्रभाव पड़ा है.
अदालतें हाई-प्रोफाइल मामलों में गैग ऑर्डर जारी कर सकती हैं, लेकिन वे प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के आरोपों के डर से बहुत कम मामलों में ऐसा करती हैं.
उन्मादी रिपोर्टिंग का दौर
जबकि संविधान का अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें गरिमा का अधिकार भी शामिल है.
सुप्रीम कोर्ट ने डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में गिरफ्तार व्यक्तियों की गरिमा की रक्षा के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए.
हमारे देश में मीडिया का यह दौर अब उन्मादी रिपोर्टिंग का हिस्सा बन चुका है. आरोप और तथ्यों के बिना ही किसी को दोषी ठहरा देना अब आम हो चुका है.
इस तरह की कवरेज के चलते ना केवल समाज का विश्वास टूटता है, बल्कि आरोपियों की निजता और गरिमा का भी उल्लंघन होता है.
मीडिया की जिम्मेदारी सिर्फ जानकारी देना नहीं, बल्कि उस जानकारी की सत्यता की भी जांच करना है. जिसमें कम से कम आज की तारीख में तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया असफल साबित हुआ है. है.