चीन के बाजार में भारतीय कंपनियों का प्रवेश
चीन के बाजार में भारतीय कंपनियों की पैठ
नई दिल्ली । डेस्क: दुनिया के कई देशों मे अपने उत्पाद भर देने वाले चीन के दवा बाजार में भारतीय कंपनियों ने भी प्रवेश की शुरूआत की है. अब, भारत से दवाईयां चीन जायेंगी. इससे पहले चीन से बल्क-ड्रग भारत आया करता था. हालांकि, यह केवल शुरूआत है लेकिन इससे न केवल भारत का निर्यात बढ़ेगा बल्कि नई बाजार की भी पहचान हो जायेगी. इससे भारतीय कंपनियों का मनोबल भी बढ़ेगा तथा देश की प्रतिष्ठा भी अंतर्राष्ट्रीय बाजार में बढ़ेगी.
गौरतलब है कि भारतीय दवा कंपनियों ने चीन के विशाल दवा बाजार में महत्वपूर्ण प्रगति की है. चीन के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण खरीद बोली (वॉल्यूम-बेस्ड प्रोक्योरमेंट या VBP) में भारतीय फर्मों ने बल्क जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति के लिए कई सफल बोलियां जीती हैं. इन दवाओं में मधुमेह के इलाज में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाने वाली दवा डैपाग्लिफ्लोज़िन भी शामिल है.
इंडिया-चाइना इकोनॉमिक एंड कल्चरल काउंसिल के अनुसार, हेटेरो लैब्स लिमिटेड, सिप्ला लिमिटेड, एनोरा फार्मा प्राइवेट लिमिटेड, और नैटको फार्मा ने चीन के सरकारी अस्पतालों के लिए फार्मास्युटिकल्स की खरीद के लिए आयोजित बोली में सफलता हासिल की है.
खासकर डैपाग्लिफ्लोज़िन की आपूर्ति के लिए जीती गई बोली में हेटेरो ड्रग्स लिमिटेड और सिप्ला लिमिटेड उन सात फर्मों में शामिल हैं, जिन्हें एक अरब टैबलेट की आपूर्ति करनी होगी. वॉल्यूम-बेस्ड प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया के तहत, इन दोनों भारतीय फर्मों को चीन के निर्दिष्ट प्रांतों में दवा की आपूर्ति का जिम्मा सौंपा जाएगा.
अन्य सफल बोलियों में, एनोरा फार्मा प्राइवेट लिमिटेड ने ऑक्सकार्बाजेपाइन टैबलेट की आपूर्ति का ठेका जीता है, जबकि नैटको फार्मा ने ओलापारिब टैबलेट की आपूर्ति का ठेका हासिल किया है. इसके अतिरिक्त, डॉ. रेड्डीज़ लैबोरेटरीज़ की चीनी सहायक कंपनी कुनशान रोटम रेड्डी फार्मास्युटिकल कंपनी ने भी चार उत्पादों की आपूर्ति के लिए बोलियां जीती हैं.
पिछले महीने हुए इस नवीनतम बोली राउंड में एंटी-इंफेक्टिव, एंटी-ट्यूमर उपचार, एलर्जी उपचार और अन्य क्षेत्रों की 55 दवाएं शामिल थीं, जिसमें 272 कंपनियों के कुल 453 उत्पादों को सफल बोलीदाताओं के रूप में चुना गया. इनमें से, भारतीय फर्मों ने कुल सात दवाओं की आपूर्ति के लिए अनुबंध हासिल किए.
इंडिया-चाइना इकोनॉमिक एंड कल्चरल काउंसिल के अनुसार, डैपाग्लिफ्लोज़िन वर्तमान में चीनी दवा बाजार में सबसे अधिक बिकने वाली स्मॉल मॉलिक्यूल दवा है, जिसकी बिक्री आठ अरब आरएमबी (लगभग $1.14 बिलियन अमेरिकी डॉलर) से अधिक है.
भारतीय कंपनियों के लिए यह सफलता चीन के उस विशाल दवा बाजार में सेंध लगाने की दिशा में एक उत्साहजनक संकेत है, जिस पर लंबे समय से बहुराष्ट्रीय और स्थानीय फर्मों का वर्चस्व रहा है. हालांकि, वॉल्यूम-बेस्ड प्रोक्योरमेंट प्रक्रिया में कीमतें काफी कम रखी जाती हैं, जिससे बहुराष्ट्रीय फर्में अक्सर बोली जीत नहीं पातीं, लेकिन इसके साथ मिलने वाली बड़ी मात्रा भारतीय फर्मों के लिए एक आकर्षक प्रस्ताव है.
उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, यह चीनी सरकार द्वारा बढ़ती बुजुर्ग आबादी और व्यापक स्वास्थ्य कवरेज के कारण प्रतिपूर्ति बजट पर पड़ने वाले बोझ को कम करने का एक प्रयास है, जिससे जेनेरिक दवाओं की कीमतें पिछले 10 वर्षों में अपने सबसे निचले स्तर पर पहुँच गई हैं.
बाजार में बने रहने के लिए, भारतीय फर्मों को चीन में न केवल उत्पादों को तेजी से विकसित और पंजीकृत करना होगा, बल्कि विनिर्माण को बढ़ाना और कॉस्ट लीडरशिप को भी लक्षित करना होगा. वर्तमान में लगभग 10 भारतीय दवा फर्मों की चीन में उपस्थिति है, जिनमें से कुछ की अपनी स्थानीय उत्पादन इकाइयां भी हैं.
भारत लंबे समय से अपने फार्मा और आईटी उत्पादों को चीन में अनुमति देने पर जोर दे रहा है ताकि लगभग 100 अरब अमेरिकी डॉलर के चीन के पक्ष में चल रहे व्यापार घाटे को कम किया जा सके. इस बोली में भारतीय फर्मों की सफलता को इस दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है.
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