इंडिया गठबंधन ने CEC के खिलाफ महाभियोग पर विचार किया
नई दिल्ली । डेस्क: विपक्षी इंडिया गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने पर विचार शुरू किया है. यह निर्णय सोमवार को गठबंधन की बैठक में लिया गया, जो संसद सत्र से पहले आयोजित हुई थी. यह कदम चुनाव आयोग द्वारा कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मतदाता सूची में अनियमितताओं के आरोपों पर सात दिनों के भीतर हलफनामा जमा करने या देश से माफी मांगने की चुनौती देने के एक दिन बाद उठाया गया है.
सूत्रों के अनुसार, गठबंधन के 20 से अधिक दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलीभगत और चुनाव आयोग की स्वायत्तता को कमजोर करने का आरोप लगाया है. यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो यह 1950 में चुनाव आयोग के गठन के बाद से किसी चुनाव आयुक्त के खिलाफ पहला महाभियोग प्रस्ताव होगा.
सोमवार को दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में, आठ विपक्षी सांसदों ने चुनाव आयोग पर हमला बोला और इसे "राजनीतिक कठपुतली" करार दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में विफलता दिखाई है.
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के वरिष्ठ सांसद मनोज झा ने कहा, "सभी कानूनी और राजनीतिक विकल्प खुले हैं." कांग्रेस सांसद और असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख गौरव गोगोई ने कहा, "इंडिया गठबंधन ने महाभियोग के विकल्प पर चर्चा की है. सही समय पर अंतिम निर्णय लिया जाएगा."
विपक्षी दलों ने एक संयुक्त बयान में कहा, "चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी को निभाने में पूरी तरह विफल रहा है. यह स्पष्ट हो गया है कि आयोग का नेतृत्व उन अधिकारियों के हाथ में है जो निष्पक्षता सुनिश्चित नहीं कर सकते. इसके बजाय, वे मतदाता धोखाधड़ी की जांच को रोकने और सत्तारूढ़ दल को चुनौती देने वालों को डराने का काम कर रहे हैं."
राहुल गांधी ने 7 अगस्त को बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा खंड में 1,00,250 "चुराए गए" वोटों का आरोप लगाया था, जिसके कारण भाजपा की जीत हुई. उन्होंने आयोग पर सत्तारूढ़ दल के साथ साठगांठ का आरोप लगाया था. जवाब में, चुनाव आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन आरोपों का खंडन किया.
संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान संरक्षण प्राप्त है. उन्हें केवल "दुराचार या अक्षमता" के सिद्ध आधार पर हटाया जा सकता है. महाभियोग प्रस्ताव को लोकसभा में कम से कम 100 या राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता होती है.
प्रस्ताव को पारित करने के लिए, दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत और कुल सदस्यता के आधे से अधिक समर्थन की जरूरत होती है. इसके बाद ही राष्ट्रपति हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं.
1950 में चुनाव आयोग के गठन के बाद से किसी भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया नहीं गया है. 2009 में, भाजपा के नेतृत्व में 200 से अधिक सांसदों ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के खिलाफ पक्षपात का आरोप लगाते हुए याचिका दायर की थी, लेकिन वह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ सका.
समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव ने मतदाता शिकायतों पर कार्रवाई न करने का मुद्दा उठाया.
उन्होंने कहा, "2022 में, हमने 18,000 मतदाताओं के हलफनामे जमा किए, लेकिन आयोग ने एक भी मामले पर कार्रवाई नहीं की."
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस को "कठपुतली का शर्मनाक प्रदर्शन" बताया.
शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने कहा, "चुनाव आयोग की प्रेस कॉन्फ्रेंस देखकर ऐसा लगा जैसे वे भाजपा के प्रवक्ता हों."
हालांकि, गठबंधन के पास प्रस्ताव के लिए हस्ताक्षर जुटाने की क्षमता है, लेकिन दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना मुश्किल है.
एक लोकसभा सांसद ने कहा, "प्रस्ताव पारित हो या न हो, हमें अपना विरोध दर्ज करना है. आयोग सवालों का जवाब देने के बजाय विपक्ष पर उंगली उठा रहा है."