क्षेत्रीय सुरक्षा पर तेहरान में बढ़ी हलचल: ईरान और मुस्लिम बहुल देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत तेज
ईरान युद्ध और बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच सऊदी अरब ने रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान के नेतृत्व में तेहरान में सीधी कूटनीतिक पहल की है. मक्का रक्षा समझौते के साझेदारों पाकिस्तान और तुर्की के साथ हुई इस बातचीत में एक नए सुरक्षा ढांचे और शांतिपूर्ण समाधान पर सैद्धांतिक सहमति बनी है.
नई दिल्ली । डेस्क: ईरान युद्ध के दुष्परिणामों और व्यापक क्षेत्रीय संकट की आशंकाओं के बीच अमरीका के मुस्लिम बहुल मध्य पूर्वी सहयोगियों ने तेहरान के साथ एक नए क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को लेकर बातचीत तेज कर दी है. इस कूटनीतिक प्रयास के तहत सऊदी अरब ने पहली बार ईरान के साथ सीधा संवाद स्थापित किया है. सऊदी अरब के राजा के छोटे बेटे और रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने तेहरान पहुंचकर ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी मोहसिन रजाई और अन्य वरिष्ठ नेताओं के साथ आमने-सामने की बैठक की.
मक्का पारस्परिक रक्षा समझौते के साझेदार देशों—पाकिस्तान और तुर्की—के सैन्य व खुफिया प्रमुख भी इस प्रतिनिधिमंडल में शामिल थे. इस सीधे राजनयिक संपर्क के बाद दोनों पक्षों में बातचीत का सिलसिला जारी रखने पर सैद्धांतिक सहमति बन गई है.
गैर-आक्रामकता समझौते और नए ढांचे की मांग
क्षेत्र में बढ़ते संकट को देखते हुए कतर और ओमान ने खाड़ी के सात अरब देशों और ईरान के बीच गैर-आक्रामकता समझौते (Non-Aggression Pact) समेत एक नए सुरक्षा ढांचे की वकालत फिर से शुरू कर दी है. कतर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इब्राहिम अल-हाशमी ने कहा कि जीसीसी (GCC) सदस्यों और ईरान के बीच नए सुरक्षा ढांचे का आधार राज्य की संप्रभुता का सम्मान और परस्पर गैर-आक्रामकता होना चाहिए. फरवरी के अंत में शुरू हुए युद्ध के बाद से कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान, कुवैत और बहरीन ईरानी हमलों की चपेट में आए हैं.
ओमान के विदेश मंत्री बद्र अल-बुसैदी ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में दिए भाषण में कहा कि खाड़ी देशों को अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठानी होगी और बाहरी ताकतों पर निर्भरता कम करनी होगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि सुरक्षा व्यवस्था से ईरान को बाहर रखने की अमरीकी नीति के कारण क्षेत्र में अस्थिरता बनी हुई है और अब एक समावेशी सुरक्षा तंत्र की आवश्यकता है.
पश्चिमी हथियारों पर निर्भरता घटाने की पहल
ईरान के जवाबी हमलों से हुए बड़े नुकसान के बाद यह माना जा रहा है कि अमरीका जीसीसी क्षेत्र में अपने सैन्य ठिकानों के ढांचे में बदलाव कर सकता है. हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि अमरीका की पूर्ण वापसी या खाड़ी देशों द्वारा अपने पुराने गठबंधनों को पूरी तरह खत्म करने की संभावना नहीं है, क्योंकि वे अमरीकी हथियारों के बड़े खरीदार हैं और उन्हें स्पेयर पार्ट्स की जरूरत बनी रहेगी.
हाल ही में तुर्की, पाकिस्तान, कतर और इंडोनेशिया ने पश्चिमी हथियार आपूर्तिकर्ताओं पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए 'बद्र रक्षा उत्पादन समझौते' का गठन किया है, जो मक्का गठबंधन के साथ-साथ एक अलग व्यवस्था के रूप में काम करेगा.
इजराइली वर्चस्व का विरोध और आंतरिक चुनौतियां
क्षेत्र के मुस्लिम बहुल देश इस बात पर सहमत हैं कि मध्य पूर्व में इजराइल का एकतरफा वर्चस्व नहीं होना चाहिए. मक्का पैक्ट के साझेदार इजराइल के आक्रामक रुख के खिलाफ एक संतुलन स्थापित करना चाहते हैं.
हालांकि, तेहरान से आ रहे संकेत चिंताजनक हैं. विशेषज्ञों का चेतावनी देना है कि ईरान की सरकार में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़े कट्टरपंथी गुट हावी हो रहे हैं, जो संयम की वकालत करने वाली आवाजों को दबा रहे हैं.
विशेषज्ञ मानते हैं कि अमरीका और इजराइल की सख्त नीतियां ईरान के कट्टरपंथियों को और अधिक आक्रामक होने का मौका दे रही हैं, जिससे होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही की स्वतंत्रता और सऊदी अरब पर हूती हमलों को रोकने जैसे मुद्दों पर ईरान से रियायत मिलना मुश्किल दिखाई दे रहा है.