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HC ने माओवादी रामचंद्र रेड्डी के मुठभेड़ की SIT जांच ख़ारिज की

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16 अक्टू. 2025, 07:56 AM 6 मिनट में पढ़ें 1

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने 14 अक्टूबर, 2025 को माओवादी नेता कथा रामचंद्र रेड्डी की मौत की जाँच के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) के गठन की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. जिसे याचिकाकर्ता ने एक "फ़र्ज़ी मुठभेड़" बताया था.


मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति विभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिका "केवल अनुमान" पर आधारित थी और स्वतंत्र जाँच के लिए पर्याप्त सबूत पेश करने में विफल रही. कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता "हस्तक्षेप के लिए कोई मामला बनाने में पूरी तरह विफल" रहा और इसे "मेरिट रहित" बताते हुए खारिज कर दिया.


मामले की पृष्ठभूमि

याचिका मृतक कथा रामचंद्र रेड्डी (उर्फ विकल्प, राजू दादा, और अन्य नामों से ज्ञात) के बेटे राजा चंद्र ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत दायर की थी. याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसके पिता और एक पारिवारिक मित्र, कादरी सत्यनारायण रेड्डी (@ कोसा दादा), 22 सितंबर, 2025 को पुलिस द्वारा एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारे गए थे.


याचिकाकर्ता की मुख्य आपत्ति यह थी कि कथित मुठभेड़ में सैकड़ों माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच गोलीबारी हुई, लेकिन केवल दो उच्च पदस्थ माओवादी सदस्य मारे गए, जबकि सुरक्षा बलों में कोई हताहत या घायल नहीं हुआ.


इसके अतिरिक्त, याचिकाकर्ता ने मुठभेड़ के समय पर भी सवाल उठाया, क्योंकि यह घटना मृतक द्वारा कथित रूप से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के दो दिन बाद हुई, जिसमें माओवादियों के आत्मसमर्पण करने की पिछली ख़बरों का खंडन किया गया था. याचिका में यह तर्क दिया गया कि मारे गए लोगों को "पुलिस ने अपने ही पार्टी सदस्यों की मदद से ज़िंदा पकड़ लिया, प्रताड़ित किया गया और बाद में मार दिया."


याचिकाकर्ता के आरोप

याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने तर्क दिया कि मृतक की माँ ने शरीर पर ऐसे घाव देखे जो मुठभेड़ के अनुरूप नहीं थे. उन्होंने आरोप लगाया कि शव पर गोलियों के ज़ख्म दिखाई नहीं दिए, बल्कि आँखों की पलक की त्वचा गायब थी, छाती पर त्वचा जली हुई और छिल रही थी, पेट पर चोट के निशान थे, और "शरीर के अन्य हिस्सों पर नुकीले हथियारों से किए गए घाव" थे.


गोंजाल्विस ने यह भी दावा किया कि अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में दिए गए अनिवार्य दिशानिर्देशों का पालन नहीं किया.


उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि डेढ़ घंटे के पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी केवल दस मिनट की थी.


राज्य के तर्क

राज्य की ओर से महाधिवक्ता प्रफुल्ल एन. भारत ने मुठभेड़ को वास्तविक बताया. उन्होंने प्रस्तुत किया कि विशिष्ट खुफिया इनपुट के बाद, एक पुलिस दल ने अबूझमाड़ क्षेत्र में 20-25 नक्सलियों के साथ मुठभेड़ की. मुठभेड़ के बाद, दो माओवादियों के शव के साथ एक AK-47 राइफल, एक INSAS राइफल और अन्य हथियार बरामद किए गए.


राज्य ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा स्थापित सभी प्रक्रियात्मक दिशानिर्देशों का पालन किया गया. इसमें NHRC को तत्काल सूचित करना, कार्यकारी मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में जाँच करना, वीडियोग्राफी के साथ पोस्टमॉर्टम, और मजिस्ट्रियल जाँच शुरू करना शामिल था.


राज्य ने SFSL (राज्य फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला) रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसने पुष्टि की कि ज़ब्त किए गए हथियार सक्रिय स्थिति में थे और हाल ही में उनसे गोली चलाई गई थी. साथ ही, मृतक के हाथों पर "फायरिंग डिस्चार्ज अवशेष" पाए गए थे. राज्य ने यह भी बताया कि मृतक का व्यापक आपराधिक इतिहास था, जिसमें छत्तीसगढ़ में 29, महाराष्ट्र में 6, और तेलंगाना में 2 मामले दर्ज थे. शरीर पर पंचर ज़ख्मों के बारे में, राज्य ने तर्क दिया कि घने जंगल के "कठिन इलाके" में ऐसे ज़ख्म संभव हैं.


कोर्ट का विश्लेषण और फ़ैसला

उच्च न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्ता के आरोप किसी भी सामग्री से पुष्ट नहीं होते हैं. कोर्ट ने कहा कि "नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मुठभेड़ सैन्य शैली के विद्रोह-विरोधी ऑपरेशन हैं. आश्चर्य या बेहतर सामरिक स्थिति के कारण कुछ मौतें या एकतरफ़ा हताहत होना असामान्य नहीं है. इसलिए, पुलिस हताहतों की अनुपस्थिति अपने आप में झूठेपन का संकेत नहीं दे सकती."


कोर्ट ने यह भी कहा कि मृतक 2007 से अपने परिवार के संपर्क में नहीं था और उसका महत्वपूर्ण आपराधिक रिकॉर्ड था. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, हाई कोर्ट ने दोहराया कि जाँच को किसी स्वतंत्र एजेंसी को सौंपना "असाधारण शक्ति" है जिसे "विरले, सावधानी से और असाधारण स्थितियों में" प्रयोग किया जाना चाहिए.


अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता और उनकी माता की यह धारणा कि मृतक को पहले गिरफ़्तार करके यातना दी गई और फिर हत्या कर मुठभेड़ का रंग दिया गया, केवल अनुमानों और संदेहों पर टिकी है. याचिकाकर्ता के पास ऐसे ठोस तथ्य/प्रमाण नहीं पाए गए जो यह स्थापित कर सकें कि घटना एक नकली मुठभेड़ थी. अदालत ने दोहराया कि बिना ठोस साक्ष्य के सिर्फ़ आशंका के आधार पर विशेष जांच या अन्य अत्यधिक उपाय मंजूर नहीं किए जा सकते.


अदालत ने राज्य के जवाब (return) का विस्तार से परीक्षण किया और देखा कि पुलिस ने मुठभेड़ के बाद जिन प्रक्रियाओं का पालन किया जाना चाहिए, जैसे NHRC को सूचना, पोस्टमार्टम के लिए मेडिकल टीम, FSL/Forensic प्रक्रियाएँ, पोस्टमार्टम का वीडियोग्राफ़ी/फ़ोटो तथा मजिस्ट्रेट द्वारा इनक्वेस्ट, इन सबका पालन होने का विवरण प्रस्तुत किया गया है. अदालत ने कहा कि ये कागज़ात और प्रक्रियाएँ रिकॉर्ड पर मौजूद हैं और इनसे याचिकाकर्ता के आरोपों को पुष्ट करने की बाध्यकारी सामग्री नहीं मिली.


याचिकाकर्ता ने पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी केवल 10 मिनट होने और फोटो न होने की बात उठाई. अदालत ने इस दावे पर भी न्यायिक दृष्टि से देखा कि राज्य की तरफ से पोस्टमार्टम, वीडियोग्राफ़ी और FSL/बैलिस्टिक रिपोर्टें प्राप्त कराकर रिकॉर्ड पर रख दी गई हैं तथा SFSL की रिपोर्ट में हथियार सक्रिय/फायर किये जाने के प्रमाण तथा हैंड-स्वैब (नाइट्रेट/फायरिंग रेसिड्यू) के नतीजे भी आए हैं, ये तथ्य न्यायालय ने संज्ञान में लिये. अदालत ने कहा कि उपलब्ध फॉरेंसिक-प्रमाण या तो जांच के लिये प्रस्तुत हैं या उनके होने का दावा रिकॉर्ड में है, इसलिए केवल संक्षिप्त वीडियोग्राफ़ी का हवाला देकर पूरी घटना को फर्जी करार देना पर्याप्त नहीं.


अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों (जैसे State of West Bengal v. CPDR व Arnab Goswami के सन्दर्भ) को उद्धृत करते हुए रेखांकित किया कि SIT/CBI को किसी भी नियमित पुलिस़-तफ्तीश से हटाकर ट्रांसफ़र करना एक असाधारण और सावधानीपूर्वक उपयोग की जाने वाली शक्ति है. केवल अतार्किक या अप्रमाणिक आरोपों के आधार पर ऐसे हस्तांतरण नहीं किये जाते; इसके लिए स्पष्ट, मजबूत और विश्वासयोग्य कारण होना आवश्यक है जो स्थानीय जांच पर संकट या संवेदनशीलता पैदा करे. अदालत ने पाया कि ऐसे अपवादजनक हालात इस मामले में स्थापित नहीं हुए.


अंततः, कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इस तरह के हस्तक्षेप को उचित ठहराने के लिए कोई असाधारण परिस्थितियाँ मौजूद नहीं थीं और याचिका को खारिज कर दिया गया.

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CGKhabar — Editor: Raghvendra Chand Singh, Raipur, Chhattisgarh. Managed by Space IX Media LLP