30 साल पुरानी बकाया सैलरी के लिए HC पहुंचे शख्स की याचिका खारिज
बिलासपुर । संवाददाता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने करीब तीन दशक पुराने वेतन बकाया के भुगतान की मांग को लेकर दायर एक रिट याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि याचिकाकर्ता को उचित समय के भीतर अदालत का दरवाजा खटखटाना चाहिए. न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करने के लिए कोई निश्चित सीमा अवधि तय नहीं है, फिर भी देरी और लापरवाही के आधार पर बहुत पुराने या ठंडे पड़े मामलों को दोबारा नहीं खोला जा सकता.
यह फैसला न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरू की पीठ ने 6 अक्टूबर को याचिका को शुरुआती चरण में ही (इन लिमाइन) खारिज करते हुए सुनाया. याचिका में साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के एक दिवंगत कर्मचारी के बेटे ने अपने पिता के 1989 से 1994 तक के बकाया वेतन के भुगतान की मांग की थी.
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसके पिता ने 1996 में इस संबंध में एक अभ्यावेदन (रिप्रेजेंटेशन) दिया था.
मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने पाया कि उक्त कर्मचारी साल 2002 में सेवानिवृत्त हुआ और 2015 में उसका निधन हो गया. न तो कर्मचारी ने अपने जीवनकाल में और न ही उनके बेटे ने पिछले तीन दशकों में इस बकाया राशि को प्राप्त करने के लिए कोई प्रभावी कदम उठाया.
इसके अलावा, अदालत में 1996 के अभ्यावेदन को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करने की कोई रसीद या पावती (अकनॉलेजमेंट) भी पेश नहीं की जा सकी.
याचिकाकर्ता के दावों में विरोधाभास भी सामने आया. एक तरफ याचिका में पिता को सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त बताया गया था, वहीं कथित अभ्यावेदन में उन्हें चपरासी श्रेणी-II दर्शाया गया था.
न्यायालय ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत असाधारण और विवेकाधीन अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने के लिए याचिकाकर्ता का उचित समय पर और सतर्कता के साथ आना आवश्यक है.
अदालत ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता अपनी मर्जी से सोता रहा और जब चाहा उठकर आ गया, जबकि कानून ऐसे रवैये को स्वीकार नहीं करता. अदालत ने कहा कि जो अपने अधिकारों पर सोता रहता है, उसे इसका खामियाजा भुगतना ही पड़ता है.