गिग वर्कर: 10-मिनट डिलीवरी पर सरकारी रोक बेअसर
नई दिल्ली । डेस्क: भारत सरकार द्वारा क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स को '10-मिनट डिलीवरी' का वादा बंद करने के निर्देश दिए जाने के बावजूद जमीन पर हालात जस के तस बने हुए हैं. समाचार रिपोर्टों के अनुसार, जनवरी में सरकार के हस्तक्षेप और गिग वर्कर्स की देशव्यापी हड़ताल के बाद भी डिलीवरी राइडर्स पर समय सीमा का दबाव कम नहीं हुआ है.
जानकारों का कहना है कि कंपनियों ने केवल विज्ञापनों और मार्केटिंग से '10 मिनट' का टैग हटाया है, लेकिन उनका व्यापारिक मॉडल अब भी रफ्तार और जल्दबाजी पर ही टिका है. दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में सरकार के निर्देश के एक हफ्ते बाद भी मोबाइल ऐप्स पर डिलीवरी का समय 10 मिनट से कम ही दिखाई दे रहा है.
कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने इस संकट को और गहरा कर दिया है. बाजार में नए खिलाड़ियों के आने से डिलीवरी का समय घटाने की होड़ मची है. भले ही कंपनियां अब आधिकारिक तौर पर '10 मिनट' का दावा न करें, लेकिन उनके डार्क स्टोर्स और एल्गोरिदम इस तरह से डिजाइन किए गए हैं कि राइडर्स को जल्द से जल्द ऑर्डर पहुंचाने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
राइडर्स का कहना है कि यदि वे तेजी से डिलीवरी नहीं करते, तो उनकी रेटिंग गिर जाती है और उन्हें मिलने वाले इंसेंटिव बंद हो जाते हैं. इससे उनकी कमाई पर सीधा असर पड़ता है, जिसके कारण वे ट्रैफिक नियमों को ताक पर रखकर वाहन चलाने को मजबूर हैं.
यह स्थिति डिलीवरी राइडर्स के लिए एक 'डेथ ट्रैप' यानी मौत के जाल जैसी बन गई है. ट्रैफिक से भरी सड़कों और खराब रास्तों पर समय से पहुंचने की कोशिश में अक्सर सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं.
कई मामलों में तो महज 18-20 साल के युवाओं को अपनी जान तक गंवानी पड़ी है. राइडर्स का आरोप है कि दुर्घटना होने की स्थिति में कंपनियां कोई वित्तीय सहायता या बीमा लाभ नहीं देतीं, बल्कि चोट लगने के बावजूद उन्हें काम पर लौटना पड़ता है ताकि उनकी आईडी ब्लॉक न हो जाए.
विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी हस्तक्षेप एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन यह केवल 'दिखावटी' बदलाव बनकर रह गया है. असल समस्या ऐप के उस सिस्टम में है जो अधिक ऑर्डर डिलीवर करने पर ज्यादा पैसे देने का लालच देता है.
जब तक एल्गोरिदम में बदलाव नहीं होगा और ग्राहकों की 'तुरंत सामान पाने' की मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक सड़कों पर काम करने वाले इन मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना नामुमकिन है.
फिलहाल, 10 मिनट की डिलीवरी का लुत्फ उठा रहा मध्यम वर्ग अनजाने में उन श्रमिकों की जान जोखिम में डाल रहा है, जिन्हें सिस्टम में केवल एक मशीन की तरह देखा जा रहाेअसर